मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

























हर चेहरे पे खुशियाँ हो
और जीवन मे हरियाली हो
शहर गाँव सब विकसित हो
घर- घर मे खुशहाली हो
यही पार्थना प्रभु से मेरी
मंगलदीप दिवाली हो

कोई दुखी मन धरा पे हो ना
चमके धरा का कोना – कोना
फ़ोड पटाखे खुशियाँ मनायें
खील बताशे जमकर खाये
पकवान भरी हर थाली हो
यही पार्थना प्रभु से मेरी
मंगलदीप दिवाली हो

गणेश लक्ष्मी की महिमा हो
हर जन की अपनी गरिमा हो
धन सम्प्दा घर आये अपार
खुशियों से भर जाये संसार
रजत बने धरती का कण-कण
ना कोई कोना खाली हो
यही पार्थना प्रभु से मेरी
मंगलदीप दिवाली हो





















हो सकता है कि मेरे सभी हिंदुस्‍तानी भाई बहन, दीपावली की पूर्वसंध्‍या पर कल काम कर रहे हों और फिर दीपावली की तैयारियों में व्‍यस्‍त हो जाएं, मैंने सोचा क्‍यों न प्रोज़ में अपने सहकर्मियों को दीपावली की शुभकामनाएं देने में मैं अग्रणी बन जाऊँ!

कुछ शब्‍द मेरी ओर से-

न तेरी है न मेरी है
ये लक्ष्‍मी तो एक देवी है।
भला करो तो खुश हो जाती,
बुरा करो दुख देती है।

जो ना पाए वो दुखी,
जो पा जाए वो भी दुखी,
पर फिर भी ससुराल की तरह
ये कभी कभी सुख देती है।

लक्ष्‍मी की महिमा अपार है।
ऐसा इसका प्‍यार है।
ये देती जहां आशीर्वाद है
वहां बहार ही बहार है।

ओम् लक्ष्‍म्‍यै नम:!
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्‍मीरूपेण संस्‍थिता, नमस्‍तस्‍यै नमस्‍तस्‍यै नमस्‍तस्‍यै नमोSनम:!

लक्ष्‍मी-गणेश आप सभी के घरों में विराजमान होकर आप सभी पर अपार धनवर्षा करें और आपके परिवार के सदस्‍यों के जीवन में शांति, सुख और समृद्घि लाएं!

शनिवार, 15 अक्टूबर 2011


आदमी

हाथी सड़क पर ,
मद मस्त जा रहा था
कुत्ता भोंका,
हाथी को नागवार गुजरा
सूंड में लपेट कर जो
पटकनी दी,
कुत्ते की दुम सीधी हो गयी
कुत्ता माँयुस हो गया ,
बोला तोड़ देते ,
अगर मेरी टांग,
कुछ दिन में ठीक हो जाती
पर आपने ने तो
आदमी बना दिया ................



खोज जारी हें



नए नए डिजाइनर
नयी नयी अप्सराएँ
कपडे लापता हे
खोज जारी हे

नए नए सर्वे
नए नए आसन
पुरुसत्त्व लापता हे
खोज जारी हे

नयी नयी नारी
नए नए आन्दोलन
घरोंदा लापता हे
खोज जारी हे

नए नए ब्लॉग
नयी नयी प्रतिभाएं
पाठक लापता हे
खोज जारी हे

नये नये अवतार
सजे धजे दरबार
इश्वर लापता हें
खोज जारी हें

रिश्तों के नये आयाम
मीडिया करे व्यायाम
इश्क लापता हें
खोज जारी हे

नये नये ढोर
कर रहे हे शोर
लोकतंत्र लापता हे
खोज जारी हे

नये नये हीरो
नयी नयी हिरोइन
हिट लापता हे
खोज जारी हे

महीने का किराना



बिना खाए पत्नी का ताना

हजम नही होता पति को खाना

देखकर इस महीने का किराना

हम ने पुछा
ये इंतनी वेराइटी की मोमबत्तियां !

इतने पोस्टर कलर और पेपर

क्या बच्चों के स्कूल में

प्रोजेक्ट के लिए लाया हे

बोली तुम

ठहरे दीया छाप ,

सामाजिक सरोकार तो मुझे निभाने हे

हर occassion पर क्या पहले बाज़ार जायुंगी !

कालोनी में पॉँच छे पके आम

हॉस्पिटल में हे

कम से कम दो तीन मोमबत्तियां

अभी लग जाएँगी

पत्नी की डांट और नव वर्ष की सुबह

तेरी स्याह जुल्फों में ढली शाम
आफताब की नव किरणों ने दस्तक बंद पलकों पर
नव उल्लास नव वर्ष
वो शरमाई , मुस्कुरायी
तड़फ से जो हमने थामा उसका हाथ
पड़ी डांट
बच्चे बड़े हो गए हे
चाय पी लो
सपने में भी जब हाथ थामोगे,
मेरा होगा
ख्वाबों की फ्रेम तुम रोज बदलते हो
पर तस्वीर मेरी ही रहेगी
सात जन्मो का ठेका हे प्यारे
तन्हाई के मजे तो सात फेरे लेते ही खत्म हो जाते हे
तुम्हारे जेसे भंवरे भूख लगते ही घर आते हे
और रहा इश्क का सवाल
तुम्हे नींद तो मेरी बाहोँ में आती हे
माशूका ठण्ड गुजरते ही पिघल जाती हे
तुम द्रोपदी का चिर हरण दिखाते हो
सीता को वनवास में नही बताते
जो दीखता हे वो बिकता हे ,
गर्म गोस्त की ख़बर हो तुम तुंरत पहुच जाते हो
एड्स का रोगी लॉन्ग शोट में दिखाते हो
जो दीखता हे वो बिकता हे ,
अंध विश्वास तुम चटकारे ले के दिखाते हो
गरीब की भूख तुम्हे दिखाई नही देती
जो दीखता हे वो बिकता हे ,
बड़ी बड़ी कोचिंग क्लास तुम रोज दिखाते हो
नाम मात्र की फी लेने वाले गुरुजन नही दीखते
जो दीखता हे वो बिकता हे ,
लोगो के रसोई घर तुम्हे नही दीखते
बेढरूम पर जासूसी कैमरा लगते हो
जो दीखता हे वो बिकता हे,
फैशन परेड में सब से पास पाए जाते हो
आग से जुलसे घरों में सब से दूर नज़र आते हो
जो दीखता हे वो बिकता हे ,
संसद के बाहर तुम रोज नज़र आते हो
मोहल्ले की गन्दी नालियां तुम्हे दिखाई नही देती
जो दीखता हे वो बिकता हे,
अब तो पेशा भी बदल गया ,
कहने को पॉवर ब्रोकिंग ,
और दलाली में
किसी कोर्परेट की डायरेक्टरी
जो दीखता हे वो बिकता हे

करवा चोथ और आइना

करवा चोथ
सूरज नही
चाँद का महत्व हे
परिवर्तन संसार का नियम हे

लिव इन का जमाना हे
सीधे मत देखो
ख़ुद पे भरोसा कम हे
आइना जरूरी हे

हर अंतरंग रिश्ता
अब बाज़ारों में बिकता हे
तीज त्यौहार की
अब ये मजबूरी हे
करवा चोथ
दिनेश : यार एक बात बताओ महिलाए करवा चोथ क्यों रखती हैं
राकेश : ताकि उनको अगले सात जनम तक एक ही पति मिले
दिनेश : सात जनम तक एक ही पति क्यों
राकेश : इसलिए की जिस पति को सुधारने में एक जनम लग गया हो वोही मेहनत अगले जनम में ना करनी पड़ी
दिनेश : तो पति क्यों नहीं रखते करवा चोथ ??
राकेश : बेचारा पति एक ही जनम में पत्नी से सात जनम की यातना झेलता हैं, ताकि उसको अगले जनम में वो पत्नी दुबारा ना मिले

शनिवार, 8 अक्टूबर 2011





गाय हमारी माता है हम इसका दूध पीते है,, इसके दूध को पीकर हमें ताकत तो आती है मगर हमारे अंदर की sanstusti ख़तम नहीं होती ..हम इसको फाड़ कर इसका खून पीना चाहते है... हम पहले इसको लट्ठो से
मार मार कर नीचे गिरा देते है फिर हम इसके गले पर एक चीरा लगाते है ये चिलाते है हम खुश होते.... इसका बहता खून देख कर मन करता है जीभ निकाल कर चाट ले... थोड़ी देर में ये मर जाती है.. फिर हम इसको फाड़ कर इसका मॉस गूदा निकालते है...खाल काट कर अलग करते है.. इसके खुर भी काट देते है... इसको गरम गर्म पानी में धोते है.. फिर पकाते है.. हम इंसान है लेकिन हमारे अंदर एक जानवर बैठा है.. सोरी जानवर इतना पत्थर दिल नहीं होता
श्री सीरवी परिवार प्रमाण पत्र


अपना नाम...........................गोत्र......................


पिता का नाम...........................गोत्र......................


माता का नाम ..........................गोत्र......................


पत्नी का नाम...........................गोत्र .....................


पुत्र का नाम ..........................गोत्र......................पुत्र वधु का नाम ......................गोत्र........................


नाम.......................................गोत्र......................
नाम........................................गोत्र........................
.
नाम.......................................गोत्र.......................नाम......................................गोत्र.........................

नाम.......................................गोत्र...................... नाम.......................................गोत्र..........................

नाम.......................................गोत्र.................... ..नाम.......................................गोत्र..........................

नाम.........................................गोत्र.....................नाम.......................................गोत्र...........................


पुत्री का नाम ............................गोत्र............... जवाई का नाम ..............................गोत्र...........................

नाम.........................................गोत्र................नाम..............................................गोत्र...........................

नाम.........................................गोत्र................नाम..............................................गोत्र...........................

नाम.........................................गोत्र.................नाम.............................................गोत्र...........................

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011



दोस्तों , आज " दशहरा " है | आप सभी को हार्दिक सुभकामनाएँ ........
" बुराई पर अच्छाई की जीत " और हम सब मिलकर इस झूटी "जीत "पर जश्न मनायेगे ,मिठाइयाँ बाटेंगे ,पटाखे चलाएंगे ,पान खिलाएंगे ............

क्या आपको लगता है कि हम जीते है ???????
नहीं ,,,,,,,,हम अपनी " हार " पर खुशियाँ मना रहे है |
...
मंदिर-मस्जिद की लड़ाई में मर गए लाखों इंसान ..............
धर्म और मजहब के नाम पर हो गए हजारों कुर्बान ...........
जिसने अन्याय के विरोध में " बाली " को मारा ," रावण " को मौत के घाट उतारा.......
पुण्य को पाप से उबारा..............मुझे उस " राम " कि तलाश है ...........
लेकिन लगता है इस युग के उस "राम " को आजीवन वनवास है .................
क्या यही " जीत " है ?????????????????? अगर है तो हम जीत कर भी हार गए है |


















विजयादशमी का दिन बहुत महत्त्व का है और इस दिन सूर्यास्त के पूर्व से लेकर तारे निकलने तक का समय अर्थात् संध्या का समय बहुत उपयोगी है। रघु राजा ने इसी समय कुबेर पर चढ़ाई करने का संकेत कर दिया था कि 'सोने की मुहरों की वृष्टि करो या तो फिर युद्ध करो।' रामचन्द्रजी रावण के साथ युद्ध में इसी दिन विजयी हुए। ऐसे ही इस विजयादशमी के दिन अपने मन में जो राव...ण के विचार हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, शोक, चिंता – इन अंदर के शत्रुओं को जीतना है और रोग, अशांति जैसे बाहर के शत्रुओं पर भी विजय पानी है। दशहरा यह खबर देता है।

अपनी सीमा के पार जाकर औरंगजेब के दाँत खट्टे करने के लिए शिवाजी ने दशहरे का दिन चुना था – बिना मुहूर्त के मुहूर्त ! (विजयादशमी का पूरा दिन स्वयंसिद्ध मुहूर्त है अर्थात इस दिन कोई भी शुभ कर्म करने के लिए पंचांग-शुद्धि या शुभ मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं रहती।) इसलिए दशहरे के दिन कोई भी वीरतापूर्ण काम करने वाला सफल होता है।

वरतंतु ऋषि का शिष्य कौत्स विद्याध्ययन समाप्त करके जब घर जाने लगा तो उसने अपने गुरुदेव से गुरूदक्षिणा के लिए निवेदन किया। तब गुरुदेव ने कहाः वत्स ! तुम्हारी सेवा ही मेरी गुरुदक्षिणा है। तुम्हारा कल्याण हो।'

परंतु कौत्स के बार-बार गुरुदक्षिणा के लिए आग्रह करते रहने पर ऋषि ने क्रुद्ध होकर कहाः 'तुम गुरूदक्षिणा देना ही चाहते हो तो चौदह करोड़ स्वर्णमुद्राएँ लाकर दो।"

अब गुरुजी ने आज्ञा की है। इतनी स्वर्णमुद्राएँ और तो कोई देगा नहीं, रघु राजा के पास गये। रघु राजा ने इसी दिन को चुना और कुबेर को कहाः "या तो स्वर्णमुद्राओं की बरसात करो या तो युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।" कुबेर ने शमी वृक्ष पर स्वर्णमुद्राओं की वृष्टि की। रघु राजा ने वह धन ऋषिकुमार को दिया लेकिन ऋषिकुमार ने अपने पास नहीं रखा, ऋषि को दिया।

विजयादशमी के दिन शमी वृक्ष का पूजन किया जाता है और उसके पत्ते देकर एक-दूसरे को यह याद दिलाना होता है कि सुख बाँटने की चीज है और दुःख पैरों तले कुचलने की चीज है। धन-सम्पदा अकेले भोगने के लिए नहीं है। तेन त्यक्तेन भुंजीथा....। जो अकेले भोग करता है, धन-सम्पदा उसको ले डूबती है।






आज दशहरा है
राम आज रावण का वध करेंगे
देखो गांधी जी कहाँ हैं
उन्हें ये न बताना
वो अनशन कर देंगे
किसी का वध करना पाप है

बुधवार, 5 अक्टूबर 2011

‎"उसके हाथ में कांटे और सपनों में गुलाब था,
जिन्दगी में खालीपन जुबां पे इन्कलाब था
पाँव में जूते नहीं वह मंजिलें पहने चला था
उसकी सूखी सी आँखों में उफनता सैलाब था
रास्ते रिश्तों को लेकर चल पड़े थे मकानों से दूर
भावना सदमें में थी भीतर भी एक फैलाब था
रिश्ते सर्द हो चले थे, सांस सहमी थी, दिशाएं शून्य थी
समंदर की थी ख्वाहिश उसे, मेरे दिल में तो तालाब था." ----
सवाल - जवाब
आदम ने पहले सफेद से पुछा... तू कौन है ?
सफेद ने कहा... मैं अकल हूं....
फिर
काली से पुछा ...तू कौन है?
काली ने कहा... मैं घमंड हूं.....
दुबारा
सफेद से पुछा... तू कहां रहती है ?
सफेद ने कहा.. मैं दिमाग मे रहती हूं
फिर
काली से पुछा.. तू कहां रहती है ?
काली बोली मैं भी दिमाग मे रहती हूं
आदम बोला वहां तो अकल रहती है
काली बोली जब मैं आती हूं तो वो खुद -ब-खुद चली जाती है....





असत्य पर सत्य

एवं अधर्म पर धर्म की विजय का पावन उत्सव

भगवान श्री राम के द्वारा दसानन रावण का विनाश अर्थात
@@@@ दशहरा @@@@
आप सभी को मेरी ओर से दशहरे की ढेर सारी बधाईयाँ
असत्य और अधर्म नामक राक्षसों का सदैव नाश होता रहे.

सोमवार, 3 अक्टूबर 2011




..आयुष्य आरोग्य वृध्दि हो , जनम दिन बधाई हो
पृथ्वी सुखदायी हो , जनम दिन बधाई हो
सुख सम्पत्ति यश कीर्ति कि प्राप्ति हो ,जनम दिन बधाई हो.
ग्रह सुखदायी हो ,जनम दिन बधाई हो..
परिवार सुखदायी हो , जनम दिन बधाई हो..
.जीवन सुखदायी हो , जनमदिन बधाई हो..

ऐसे जो भी आशीर्वचन है , देते जाओ और जनम दिन बधाई बोलते जाओ..तो ये होगा असली हैप्पी बर्थ डे ..!! न्यू जर्सी वाले आसारामयण का १०८ बार पाठ कर रहे, लंदन वाले हैप्पी साक्षात्कार दिन..
तुझ में राम मुझ में राम सब में राम समाया है..
कर लो सभी से प्यार जगत मे कोई नही पराया है….
एक ही माँ के हम सब बच्चे ,एक ही पिता हमारा है
फिर भी ना जाने किस मूर्खो ने लड़ना हमें सिखाया है…
तुझ मे ॐ मुझ में ॐ..
….हिंदु का बेटा हो चाहे मुसलमान का… जनमता है तो पहली ध्वनि “ॐ” ही बोलता है…(बापूजी ने नवजात शिशु का पहला ध्वनि “ॐ” होती ये स्वयम आवाज निकालकर स्पष्ट किया..) तो पहला ही ध्वनि ओमकार ध्वनि है..
….हिंदु हो ,चाहे मुस्लमान हो चाहे , ईसाई हो ,बीमार पडता है कराहते हुये जो ध्वनि निकालता है वो भी “ओमकार का ॐ ध्वनी ” ही है..(बापूजी ने कराहने के ध्वनी निकालकर स्पष्ट किया)
……सिर्फ मनुष्य ही नही लेकिन कुत्ते का बच्चा भी ठंड लगती और माँ आस पास नही दिखती तो जो आवाज निकालता तो उसमे भी “ॐ” कि आवाज सुनायी देती है…मैंने नही सिखाया उनको..
…आमिर हो चाहे गरीब हो , विद्वान हो चाहे अनपढ़ हो , सब मे एक ही स्वाभाविक तत्व है..उस चैत्यन्य की सत्ता है…इस लिए…
-मुसलमानो के “अल्लाह हो अकबर “ मे भी वोही “ॐ” मिला हुआ है..
-सीखो के “सतनाम” मे भी वोही “ॐ” सुनायी देता है..
-शैव और शाक्तो के मंत्रों मे भी वोही ॐ सुनायी देता है…

मेरा मनपसंद भारतीय लोक नाच


मेरा मनपसंद भारतीय लोक नाच डांडिया है। बहुत तरह के रास है, लेकिन डांडिया रास सबसे मशहूर है। डांडिया रास पश्चमी भारत से है, गुजुरात में। डांडिया रास में आदमी और औरतें साथ साथ नाचते हैं। उनके हाथ में दो डांडिया हैं। वे डांडिया हाथ में घूमाते हैं और दोनों डांडिया को मारते हैं। पुराने दिनों में, डांडिया रास ज्यादा गाना नहीं था। सिर्फ़ दोल का आवाज काफ़ी था। अब, डांडिया रास में ज्यादा गाना है और दूसरे बाजे है। पचास साल पहले, हिन्दुस्तानी फिल्में में डांडिया रास का इस्तमाल शुरू हुआ। इस के कारण, डांडिया रास का तरीका बदल गया। उधारानार्थ, बहुत लोग अम्रीका में सिर हिलाते है।
आदमी और औरतें बहुत रंगीले कपड़े पहनते हैं, और औरतें बहुत सुंदर गहने पहनते हैं।




गुजरात में नवरात्री सबसे रंगीन त्यौहार है। अक्तूबर में यह त्यौहार नौ रत मनाया जाता है। पिछले दिन दसरा कहा जाता है। एक दिन पहले लोग गॉव का कटरे और मन्दिर में आते हैं। वे गाते और नाचते है तक सुबह पूर्व। त्यौहार के समय देवी माँ का पूजा किया जाता है। जब कारीगर उनके बाजे का पूजा करते है, कृषक उनके हल, योदा उनके आयुध, और छात्र उनके किताबें तब त्यौहार समत्प करता है। नवरात्री त्यौहार पक्षात के नजदीक है। यह दिन शरद परनीमा कहा जाता है। चंद उजाला के निचे लोग चावल खाते और दूध पीते हैं। गुजरात में देवी माँ के बारे में सबसे प्रचलित मंदिर अम्बा माता और बेचार्जी माता हैं। नवरात्री दिनों में लोग ये मंदिर घुमने जाते हैं और गुजराती लोक नाटक आनंद लेते हैं।

बातें

बातें बातें बातें,
इधर उधर की बातें,
घर में बातें,नुक्‍कड़ पर बातें,
गहरी बातें, कोरी बातें,
चुभती बातें,हंसाती बातें,
उलहानी बातें, ठठाती बातें,
बोली अनबोली बातें,
भूली बिसरी बातें,
अकेले में मुस्‍कान जगाती बातें,
रेडीयो टीवी की इक तरफ़ा बातें,
उफ़न पड़ने को मन में धुमड़ती हजारों बातें,
बस में बातें, ट्रेन में बातें,
पाखानो में भी मोबाइल पर बातें,
तकियों के नीचे दुबके मोबाइल
खामोश कंपन से,
मिसड कॉल की बातें,
चलते लेक्‍चर में स म स से बातें,
दोनों कानों पर चिपके एक नहीं दो दो मोबाइल,
मुहँ भी दो होते काश की बातें,
खामोश मोबाइल और स‍फ़ेद स्‍याह कंपुटर,
टकटकी लगाये प्‍यासी आखें,
मौत सा सन्‍नाटा है,
बजती घंटी,चमकती हरी बत्‍ती,
खनकती हंसी,
हर सासँ की तार हैं बातें,
कितना कुछ़ है कह जाने को
k‍या तुम सुनोगे मेरी बातें

औरकुट के नाम

औरकुट के नाम
क्‍लासों में, गलियारों में,
औरकुट, औरकुट, का शौर सुना,
देख आने का मन बना,
उपवन के प्रवेशद्वार से अदंर झांका,
बच्‍चे खेल रहे थे,धमाचौकड़ी उछलकूद,हँसते गाते,

निकल जाऊं मैं, मेरा यंहा क्‍या काम,
क़दम पलटने को थी मैं,

आई एक आवाज,आओ दोस्‍त कं चले,
आश्‍चॅयचकित सी मुड़ कर देखा,
इक् बच्‍चा था,उमर का कच्‍चा था,

ने हैरानी से पूछा,"कौन मैं?",हँा हँा तुम भी,

से देखा,कई हँसती आखें, नन्‍हें हाथ बुला रहे थे,

हँस कर कहा, "बेटा",मुझसे क्‍या बात करोगे,

नहीं हो जाओगे,

वो, बेटा नहीं दोस्‍त,

था गुमनामी का बेबाकपन,

युवापीड़ी के मन का खुलापन,याँ फ़िर कोरा अकेलापन,

किसी को आत्‍मसात्‌ करने को तैयार,

उजले बालों पर दोस्‍ती की चादर डाल,

मेरा हाथ, ले चले ये नन्‍हें दोस्‍त मेरे,

गलियारों में।कभी हँसी मजाक,

कभी रोने को मागंते कधां उधार,

जाते कभी मन के गहरे राज,

शरारती आखों वालासकुचाते से पूछ डालता,
क्‍युं दोस्‍त, कभीतुम्‍हारा भी था ऐसा हाल,
, कहती, हँा दोस्‍त, यही है जिंदगी,
समझ गयी मैं, नये जीवन का सत्‍य,
नाता सिफॅ दोस्‍ती का,

सब रिश्‍ते मिथ्‍या,
कोइ आस नहीं, कोइ बाधं नहीं,

चाहे रम लो तुम,और जब चाहे निकल लो तुम,
मन के सब सशंय,बेझिझक, अब मैं इनके संग हँसती हूं,गाती हूं,टोक देती हूं,

फिर
नाच भी लेती हूं,रोज शाम मैं इक नया जीवन जी लेती हूं

दु:खता है

दु:खता है


गले में कसी इस चुन्नी को सिर्फ एक बार खोल दो
इतना तो कहने दो कि दु:खता है
मेरी छोटी सी सिसकी तुम्हें क्या डरायेगी
कहाँ तुम्हारी लकाँ ढह जाएगी
तुम्हारी तो बरसों की तैयारी है
सड़ी गली संस्कर्ती में लिपटा तुम्हारा ये मन
आखों पर खिचें मोटे काले पर्दे
बड़े जतन से छीली मेरी जबां
मेरी मौन चीख
ये सब कहाँ भेद पायेगी
अच्छा! सलीब नहीं हटाते तो न सही
कम से कम कधां तो बदलने दो
कि दु:खता है

तन्हाई

तन्हाई

आने वाली खामोश तन्हाई
लड़कपन में ही
अगाह करने कई बार चली आई थी
मैनें नींद की खुमारी में दस्तक सुनी अनसुनी
आस पास फैली खिलखिलाहटों से
अपना दामन भर लेने को मैनें खिड़की खोलनी चाही
पर साकलँ अटक गयी
मैंने भरपूर कौशिश की
कई साल कौशिश की
मेरे हाथ लहुलुहान हो गए
कितनी बार लगा कि साकलँ अब खुली कि तब खुली
पर साकलँ न खुलनी थी, न खुली
दूसरों की मुस्कुराहटें कब अपने लबों पर सजीं हैं
अपने अन्दर की घुटन से घबरा कर
आखिर मैंने दरवाजा खोल दिया
मेरी खामोश तन्हाई मदं मदं मुस्कुराती
दबे पावँ अन्दर चली आई
अब मैं सोच रही हूँ कि
दरवाजा खुला रखुँ या बन्द कर दूँ

दिवाली की रात

दिवाली की रात

कहने को चार दिवारें अपनी थीं
काले चूने से पुती हुई,
पहली दिवाली की शाम,
न दिया न बाती,
न जान न पहचान,
ठंडा चुल्‍हा, घर में बिखरा सामान,
अंजान बाजारों में ढूढ़ती पूजा का सामान,
दुकानों की जगमग,
पटाखों का शोर,
सलीके से सजी दियों की पक्‍तियां,
मेरे घर से ज्‍यादा मेरे मन में अधेंरा भर रहीं थीं,
अकेलेपन की ठिठुरन, बोझिल कदम,
लौटते हुए माँ लक्ष्‍मी से बार बार माफी मांग रही थी,
प्रार्थना कर रही थी,
इस अधेंरे ठडें घर पर नजर डाले बिना ना निकल जाना,
लौटी तो देखा दरवाजे पर दो सुंदर से दियेअपनी पीली पीली आभा फैला रहे थे,
दो सुदंर सी कन्‍यांए सजी सवंरी,
हाथों में दियों की थाली लिये खड़ी मुस्‍करा कर बोलीं,
आंटी दिवाली मुबारक,
आश्‍चॅयचकित मैं,
हँस कर बोलीं हमारे यंहा रिवाज है,
अपना घर दियों से रौशन करने से पहले पड़ोसियों के घर जगमगाओ,
शत शत प्रणाम उन पूर्वजों को जिन्‍होंने ये रस्‍मों रिवाज बनाये,
शत शत प्रणाम उन बहुओं को जिन्‍होंने ये रस्‍मों रिवाज खुले मन से अपनाये

बड़ी छोटी

बड़ी छोटी

वो सावन की घटाएं,झूलों की ऊँची पींगे,
वो बेफिक्री के दिन,
लाल इमली के चटकारे, चूरण के चस्के,
वो गीटे के खेल,वो घर की रेलपेल,
छुट्टियों में चचेरी,मौसेरी बहनों का आना,
रात भर चादरों में छिप कर घुसर पुसर करना,
दबी दबी हंसी, चमकती आखें,
क्या बातें चल रहीं हैं,
कान लगाये, चुपके से दीदी के बिस्तर पर चढ़ती,
दीदी घुड़कती, जा यहाँ से, बड़ों के बीच नहीं बेठते
खिसियाई सी, रोनाई सी माँ के आँचल में सिमटती,
सुनने को बेकरार, माँ-मौसी कयुँ ठठाती,
घुड़कती आवाज,छोटे भैय्या के पास सोजा,
बड़ों की बातों में नहीं बेठते,
हाय, काश मैं बड़ी होती,
हंसती गाती, दीदी का काला चश्मा,
माँ की लिप्सटिक, माथे की बिन्दिया
मेरी हो जाती

वक्त के रेले ने ठेलठाल खड़ा कर ही दिया
अहा, अब मेरी बारी आई,
हाय, कहाँ गये सब लोग, उजड़े गुलशन हैं
छुट्टियाँ ही नहीं होतीं,
कौन सी क्लासेस,कौन सा कॉलेज,
नीड़ बस गए, जिदंगी हाथों से
रेत सी फिसल गयी
मन के किसी कोने में
अब भी झरना बहता है, कल कल छल छल,
पावों में थिरकन है, होठों पे गीत,
सावन की घटा कई पोर छू जाती है,
झाड़ियों के झुरमुट से आती घुसर पुसर,
क्या बातें हो रहीं हैं,
मन जानने को व्याकुल,
कुछ नहीं ऑंटी, आप जाओ ना,
हाय, काश मैं छोटी होती

पतंगी चिड़िया

पतंगी चिड़िया

यूं ही इक शाम नभ विचरते
कुछ पतंगे मिलीं,
बादलों से बातें करती, महाराणी सी तेजस्वी
लाल पतंग उपेक्षा भरी नजर डाल ,
मुँह बिचकाती आगे बढ़ ली,
तालाब के उनींदे कंवल सी,
पीली पतंग आत्मध्यान में खोयी थी,
शेर मुँह वाली कालिया ,
मेरा निरीक्षण करने इतनी पास आयी
कि मेरी चीख निकल गयी,
तितली सी नाचती, हरे दुपट्टे वाली
गुलबिया खिलखिलाती मेरे पास खिसक आयी,
डर गयीं? कौन हो तुम ? हमारी बिरादरी की तो नहीं,
मैंने नाक सुनकी, मैं चिड़िया,
बिरादरी क्या होती है,
हरी पूंछ लहराते, गहरी द्रष्टी डाल, परिक्रमा की,
घुड़की,तुम्हारी डोर कहाँ,कहाँ रहती हो,
तभी पीली पतगं नींद से जागी,गुलबिया पर झपटी,
लगा डोर कट जाएगी,गुलबिया बाल बाल बची,
धौकंनी सी चलती सासों को संभाला, दुपट्टे को लहराया,
मेरी प्रश्नीली आखों में झांका, हंस कर बोली
वो दूसरे मुहल्ले की है ना,
मैंने पूछा, ये मुहल्ला क्या होता है,
उसने बड़ी गंभीर मुद्रा धारण की,
मुझ से कुछ ऊँचा उड़ी,
मानो गुरू आसन ग्रहण कर रही हो,
अरे बुद्धु , ये भी नहीं मालूम
आजकल के गुरू बताते कम पूछते ज्यादा हैं
मेरे सपाट चेहरे को देख, लंबी सांस भरी
पूंछ फड़फड़ाई, समझाया,
एक रंग,एक कागज से बने, एक ही जात पांत
मित्र होते हैं, बिरादरी होते हैं,एक मुहल्ले में रहते हैं,
मैंने सिर हिलाया, कुछ पल्ले नहीं पड़ा,
झुंझलाई वो, कुछ समझती ही नहीं हो,
क्युं आयी हो
पीली पतंग फिर झपटी, मेरी चीख निकल गयी,
गुलबिया बाल बाल बची,
मेरे कहने पर थोड़ा सुस्ताने को मेरे कोटर में आयी,
साँझ बेला,दूर दूर से भूख की जंग जीत कर लौटे
रंगबिरंगी पक्षी,गलबहियाँ करते,बतियाते थे,
दूर-सदूर के देशों से आए मेहमां स्नेही आतिथ्य पाते थे,
मस्ती की तान छिड़ी थी,
न कोई जात पात थी, न मार पीट,
गुलबिया हैरान खड़ी थी
हाथ बढ़ा कर मैंने पूछा- दोस्त?
बरगद की डाली से लिपटी वो, चक्कर घिन्नी सी घूमी,
डोर कट गयी, मुस्कायी वो, हाथ बड़ा कर बोली
मैं पतंगी चिड़िया, ठीक ?
गलबहियाँ कर हम दोनों झूम गयीं
बैरी मन


दुनिया के रेले, आते जाते लोग,

सड़क किनारे बैठे हम अकेले,

उड़ती सी नजर, ठिठके कदम,

जाते अपने रास्ते,

कौतुहल, खिलती मुस्कान,

दौस्ताना फ़ैले हाथ,

कछुए सी खुद में सिमटना,

कैसे भूलूँ,

वो सब कुछ कदम हम कदम,

कर गये मुझे,

अपने ही अधेंरों में गुम,

नीलकठं सा बैरी मन,

आज भी दूसरों की पीड़ा से

इसका गहराता नीला रंग,

हसीं की खनक से जब कोई

कछुए का खोल टकटकाता है,

तू सब भूल जाता है,

रस्सी छुड़ाए बैल सा बाहर निकल आता है,

कितना समझाया,

अब बस कर,

ये गिरने पड़ने का खेल,

अब इन हड्डियों में तेरी चोटें सहने की ताब कहाँ,

खुशी, इमानदारी सब कोरी मर्गतर्षणा हैं,

सच है सिर्फ़ धोखा, खुदगर्जी,

झूठ से प्यार कर,

खुशी मिले या न मिले,

चोट तो न खायेगा!!
मैं
मैं मास्टर चाबी हूँ,
जब असल चाबी कहीं इधर उधर हो जाती है,
मैं काम आती हूँ,
मैं वो थाली हूँ,
जिस में सहानुभुती के कुछ ठीकरे
बड़े सलीके से सजा कर परोसे जाते हैं,
मैं वो लकड़ी हूँ,
जो साँप पीटने, टेक लगाने के काम आती हूँ,
कुछ न मिले, तो हाथ सेंकने के काम आती हूँ,
मैं ऑले में सजी धूल फाकँती गुड़िया हूँ,
जिस पर घर वालों की नजर मेंहमानों के साथ पड़ती है,
मैं पैरों में पड़ी धूल हूँ,
जो ऑधीं बन कर अब तक तुम्हारी आखों में नहीं किरकी,
मैं कल के रस्मों रिवाज भी हूँ, और आज का खुलापन भी,

मैं ‘आजकल’ हूँ,
जिसके ‘आज’ के साथ ‘कल’ का पुछल्ला लगा है,
जिसे जब चाहा ‘आज’ के आगे रख दिया,

मैं आकड़ों का हिस्सा हूँ,
पर कैसे कह दूँ कि हाड़ माँस नहीं,

खुली वसीयत

खुली वसीयत



इसके पहले कि तालू से चिपके,

ये पटर पटर चलती जबां,सुन मेरी वसीयत बेटा बैठ यहां,
कुछ बातें तुझसे कहनी हैं,
जो मेरे मरने से पहले और मरने के बाद तुझे निभानी हैं,

जब जीवन धारा सूखने लगे, जबां न चले,
करवट मौह्ताजी हो, आखँ न खुले,
तुझसे मेरी विनती है,
इन रिसती सासों को सुइयों नलियों कि सजा न हो,




किसी की रोजी रोटी की तिक्कड़म का सामान न हो,खिसका देना खटिया मेरी उस खिड़की के पास,
नजरों से आलिंगन कर लूं अपनी अमराई का अंतिम बार,
मेरे गालों को चूमे मन्द मन्द ब्यार, ओड़ूं सावन की फ़ुहार,
दवाइयों की बदबू,ठ्डे लोहे के बिस्तर,ए सी की बासी हवा,
इन अटकी सासों को मत देना ये सजा,

छूटे सासें ,कटे सजा तो मेरी खुशियों में शामिल होना,
किसी अच्छे से होटल में सपरिवार स्वनिमत्रंण देना,
निर्जीव मिट्टी की खातिर जीवित पेड़ों की ह्त्या,
ये पाप न मेरे सर देना,
ये हरियाली भविष्य की धरोहर,मेरे लिए हुआ पराया,
न जलाना, न गाड़ना, न चील कऊऔं को खिलाना,
मुझसे न हो मैली हवा, माटी , ये नदिया,
किसी मेडिकल कोलेज में दे देना दान,
शिक्षक थी, शिक्षक हूँ,निभाऊँ मर कर भी शिक्षक धर्म
मेरे अंगों को चीर फ़ाड़ के जाने बच्चे मर्ज का मर्म,




जिस सखा से जीवन भर बतियाई हूँ,
उल्हाने दिए और मुस्काई हूँ,
उससे मिलने को पंडित के श्लोकों कि दरकार कहाँ,
न सहेजना दिवारों पर मेरे निशां,
तू मेरी जीवंत निशानी है, फ़ोटो में वो बात कहाँ,
न याद कभी करना मुझको, आगे बढ़ना सिखलाया तुझको,
ले चली हूँ बस मैं इन एहसासों को, इस मन्थन को,
जिसने जीवन भर सताया मुझको,
अब मेरी बारी आयी, सजाए-मौत देने की इनको

दिवाली की रात

दिवाली के उपलक्ष्य में दिवाली की शुभ कामनाओं के साथ अपनी एक पुरानी रचना फ़िर से प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसमें एक राजस्थानी परंपरा को नमन किया गया है। ये कविता लिखी गयी थी जब मैं ने मकान बदला था



दिवाली की रात



कहने को चार दिवारें अपनी थीं



काले चूने से पुती हुईं



पहली दिवाली की शाम



न दिया न बाती



न जान न पहचान


ठंडा चुल्हा, घर में बिखरा सामान,



अन्जान बाजारों में ढूढंती पूजा का सामान,



दुकानों की जगमग, पटाखों का शोर,



सलीके से सजी दियों की पक्तियां,



मेरे घर से ज्यादा मेरे मन में अंधेरा भर रही थीं,



अकेलेपन की ठिठुरन, बोझिल कदम,



लौटते हुए माँ लक्ष्मी से बार बार माफ़ी मांग रही थी,



प्राथना कर रही थी,



इस ठंडे अंधेरे घर की तरफ़ नजर डाले बिना न निकल जाना



लौटी तो देखा, दरवाजे पर दो सुन्दर से दिये



अपनी पीली पीली आभा फ़ैला रहे हैं,



दो सुन्दर सी कन्याएं सजी संवरी



हाथों में दियों की थाली लिए खड़ी



मुस्कुरा कर बोलीं



ऑटी दिवाली मुबारक


आश्चर्यचकित मैं,



हंस कर बोलीं



हमारे यहां रिवाज है



अपना घर रौशन करने से पहले



पड़ौसियों का घर जगमगाओ



शत शत प्रणाम उन पूर्वजों को



जिन्हों ने ये रस्मों रिवाज बनाए



शत शत प्रणाम उन बहुओं को



जिन्हों ने ये रिवाज खुले मन से अपनाए

अहिल्या बना दो न

अहिल्या बना दो न

हूँ तो साधारण सा पत्थर
गोला गया ठोकरें खा खा
पगली, तुम समझीं मैं अहिल्या
नित तुम्हारी वंदना पाता
पर कुछ न कह पाता
भ्रमित पुजारी देख अक्षत, रगोंली,
तुम भी धोखा खा गये
रास्ते का पत्थर जड़ दिया मंदिर के प्राचीर में
ये पगली पुजारन फ़िर भी न मानी
करती रही नित सांझ दीप
मौन आखों से ताकता
उसकी श्रद्धा और विश्वास का प्रकाश
यूं तो बहुत फ़र्क है
मुझमें और प्राचीर की कोठरियों में कैद
उस मूर्त रूपी पत्थर में
मगर अब मजबूर हूँ बनुं अहिल्या गर बन सकूं
ओ पुजारी जगाओ सोये मर्यादा पुरुषोतम को
कह दो कि हे राम गर सोके भी जागते हो
गर सुन सकते हो भक्तों की पुकार
तो इस भ्रमित अंधविश्वासी श्रद्धा की खातिर
इस पतित पत्थर को ठोकर मार कर
अहिल्या बना दो न


एहसास


तेरी गरम बाहों को आज भी ओढ़ कर सोता हूँ मैं


तेरी सासों की महक से आज भी मदहोश होता हूँ मैं


तेरे केसुओं को आज भी अपनी उंगलियों से सहराता हूँ मैं


तेरी रूह के आइने में खुद को आज भी देख पाता हूँ मैं





तेरे जिस्म का एहसास आज भी वैसा ही बरकरार है


तेरे बदन की खुशबु से आज भी दिल की दुनिया गुलजार है


तेरे हाथ को अपनी दो हथैलियों में रख कर


निगाहों से हाले दिल सुनाने का सिलसिला भी जारी है





मेरी बेजुबान आखें तेरी सिलवटों का आइना बनकर


मुझे रोज सहर में झिंझोड के जगा देती है


मैं महसूस करता हूँ ये सब, इन एह्सास को जी नहीं पाता


फ़िर भी, वो एह्सास है जो जिन्दा है आज भी , सांस ले रहा है


काश हम थोड़ी देर और साथ जी पाते, तुम और मैं


खैर, इन एहसासों का मैं शुक्रिया कैसे करुं


कि तुम्हें अब तक मुझसे जोड़ के रखनेवाले वो ही तो हैं


ये एहसास ही तो है, जो हमको जोड़े रखेगें…हमेशा।

तो

तो


मेरी दिवारों में बड़ी बड़ी खिड़कियां है,
दिखती है उनसे आस पास फ़ैली,
बच्चों की किलकारियां,
अलसायी दुपहरिया की गप्पें,
सीती,पिरोती, पापड़ बेलती कलाइयों की खनकती चूड़ियां,
दिवारों के इस पार पसरा पड़ा है अजगरी सन्नाटा,
बड़ी बड़ी अलमारियां, किताबें ही किताबें,
दोस्त हैं मेरी, पक्की दोस्त,
सवाल पूछूं तो जवाब देती हैं
कभी कभी खुद भी पूछ लेती हैं,
कहानी, कविता सुनाती हैं ,
दुनिया की सैर कराती हैं,
मेरे संग मस्ती की तान छेड़तीं तो……।


नाक तक भरे रेल के डिब्बे,
गाती, बुनती मैथी धनिया साफ़ करती
ये अनजानी रोज की हमसफ़र मुसाफ़िरनें,
उनकी चुहलबाजी में शरीक होने को मचलता मेरा मन,
आस पास फ़ैले हजारों नाम गूंजते हैं
इन कानों में,
कोई मेरा भी नाम पुकारे तो………


दोस्ती की पहल करने को
बैठने की जगह देखड़ी हो जाती हूँ,
वो थैंक्यु कह बैठ जाती है
और खो जाती है अपनी रंग रलियों में
बिना नजर घुमाए
मैं बगल में दबी किताब को ,
किताब मुझको देखती है,
अगर किताब कुछ बोल पड़ी तो………
हमें भी ख़बर है


हमें भी ख़बर है, तुम्हें भी ख़बर है,
ये जिसकी ख़बर है वो बेख़बर है॥


जमीं तो वही है, वही आस्मां है,
मगर रंग मिट्टी का बदला हुआ है,
नजर बेनजर क्यों?ज़ुबां बेज़ुबां क्यों?
ये चारों तरफ़ बस धुंआ ही धुआं क्यों?
यहां घुट रहा दम, यहां मौत-मातम,
यहां ज़िंदगी ढो रही हर उमर है॥


वतन भी वही, हमवतन भी वही हैं।
मगर दिल की धड़कन मे सरगम नहीं है,
यहां ज़ख़्म ही ज़ख़्म हैं, मरहम नहीं है,
बिना राह के रहनुमा कम नहीं हैं।
ये इंसा में वहशत, ये अपनों से दहशत,
अब अपने ही आंगन में लुटने का डर है॥


मुखौटों की मंडी में आबाद चेहरे,
सियासत की खेती, गुनाहों के पहरे
करे कौन इंसाफ़ मुंसिफ़ ही बहरे,
ये मीनार कालिख की गुंबद सुनहरे
यहां मौत जिंदा है, इंसा दरिंदा है,
ये पूरा शहर पत्थरों का नगर है॥






" याचक बन कर दुख आया फ़िर मन के द्वारे।
दान कर दिये मैं ने भी सुख के पल सारे॥"


" एक पंख पर पर्वत ढोए,
एक पंख पर स्वपन संजोए,
कितनी दूर उड़ेगा रे मनपाखी॥"


"ढूंढ रहे मेले में अपनी ही परछाईं,
सूनेपन से शायद युग युग का नाता है"


"सबको ही तलाश है,
उससे ज्यादा की,
जितना जिसके पास है"


"टुकड़ा टुकड़ा जी रहा है ,
आदमी कितना बिखर कर ।
जिंदगी तू क्या करेगी,
एक पल सज कर संवर कर्॥


धज्जियां कितनी उड़ी हैं,
राह बिन मोड़े मुड़ी हैं,
चाह की हर इक चिता पर, आस ही जिंदा खड़ी है।
आत्मा मर जाए तो क्या, तन टिका रहता उमर भर॥"


" मैं जिन्दगी को ढूंढता रहा, जिन्दगी मुझे ढूंढती रही।
उम्र की मशाल बुझ गयी, न मैं मिला न जिंदगी मिली।।






कबिरा बैठा लिए तराजू
कबिरा बैठा लिए तराजू, तौल रहा दुनियादारी।
जो भीतर से जितना हल्का, बाहर से उतना भारी॥


जो कबिरा को ही न जाने, खुद को भी कैसे पहचाने।
राम झरोखे बैठ कर देखे- दीन-धरम मज़हब के झगड़े,
पंडित मुल्ला व्यापारी॥


दर्शन के बाजार बड़े हैं। नीचे गिर कर लोग खड़े हैं।
मान मिले ईमान बेचकर- पूजा, वंदन या अभिनंदन,
सभी समर्पण बाज़ारी॥


नेकी तो बस बंजारा है, बदी आज का ध्रुवतारा है।
काग़ज से हल्की है काया – दस से कहीं बड़ी है छाया,
गौरव गाथा अखबारी॥


बचपन बिकता, यौवन बिकता, अपनों का अपनापन बिकता
हर पलड़े पर सिक्का भारी- खुद सौदा, खुद ही सौदागर,
हम रिश्तों के व्यापारी॥