गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011



दोस्तों , आज " दशहरा " है | आप सभी को हार्दिक सुभकामनाएँ ........
" बुराई पर अच्छाई की जीत " और हम सब मिलकर इस झूटी "जीत "पर जश्न मनायेगे ,मिठाइयाँ बाटेंगे ,पटाखे चलाएंगे ,पान खिलाएंगे ............

क्या आपको लगता है कि हम जीते है ???????
नहीं ,,,,,,,,हम अपनी " हार " पर खुशियाँ मना रहे है |
...
मंदिर-मस्जिद की लड़ाई में मर गए लाखों इंसान ..............
धर्म और मजहब के नाम पर हो गए हजारों कुर्बान ...........
जिसने अन्याय के विरोध में " बाली " को मारा ," रावण " को मौत के घाट उतारा.......
पुण्य को पाप से उबारा..............मुझे उस " राम " कि तलाश है ...........
लेकिन लगता है इस युग के उस "राम " को आजीवन वनवास है .................
क्या यही " जीत " है ?????????????????? अगर है तो हम जीत कर भी हार गए है |


















विजयादशमी का दिन बहुत महत्त्व का है और इस दिन सूर्यास्त के पूर्व से लेकर तारे निकलने तक का समय अर्थात् संध्या का समय बहुत उपयोगी है। रघु राजा ने इसी समय कुबेर पर चढ़ाई करने का संकेत कर दिया था कि 'सोने की मुहरों की वृष्टि करो या तो फिर युद्ध करो।' रामचन्द्रजी रावण के साथ युद्ध में इसी दिन विजयी हुए। ऐसे ही इस विजयादशमी के दिन अपने मन में जो राव...ण के विचार हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, शोक, चिंता – इन अंदर के शत्रुओं को जीतना है और रोग, अशांति जैसे बाहर के शत्रुओं पर भी विजय पानी है। दशहरा यह खबर देता है।

अपनी सीमा के पार जाकर औरंगजेब के दाँत खट्टे करने के लिए शिवाजी ने दशहरे का दिन चुना था – बिना मुहूर्त के मुहूर्त ! (विजयादशमी का पूरा दिन स्वयंसिद्ध मुहूर्त है अर्थात इस दिन कोई भी शुभ कर्म करने के लिए पंचांग-शुद्धि या शुभ मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं रहती।) इसलिए दशहरे के दिन कोई भी वीरतापूर्ण काम करने वाला सफल होता है।

वरतंतु ऋषि का शिष्य कौत्स विद्याध्ययन समाप्त करके जब घर जाने लगा तो उसने अपने गुरुदेव से गुरूदक्षिणा के लिए निवेदन किया। तब गुरुदेव ने कहाः वत्स ! तुम्हारी सेवा ही मेरी गुरुदक्षिणा है। तुम्हारा कल्याण हो।'

परंतु कौत्स के बार-बार गुरुदक्षिणा के लिए आग्रह करते रहने पर ऋषि ने क्रुद्ध होकर कहाः 'तुम गुरूदक्षिणा देना ही चाहते हो तो चौदह करोड़ स्वर्णमुद्राएँ लाकर दो।"

अब गुरुजी ने आज्ञा की है। इतनी स्वर्णमुद्राएँ और तो कोई देगा नहीं, रघु राजा के पास गये। रघु राजा ने इसी दिन को चुना और कुबेर को कहाः "या तो स्वर्णमुद्राओं की बरसात करो या तो युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।" कुबेर ने शमी वृक्ष पर स्वर्णमुद्राओं की वृष्टि की। रघु राजा ने वह धन ऋषिकुमार को दिया लेकिन ऋषिकुमार ने अपने पास नहीं रखा, ऋषि को दिया।

विजयादशमी के दिन शमी वृक्ष का पूजन किया जाता है और उसके पत्ते देकर एक-दूसरे को यह याद दिलाना होता है कि सुख बाँटने की चीज है और दुःख पैरों तले कुचलने की चीज है। धन-सम्पदा अकेले भोगने के लिए नहीं है। तेन त्यक्तेन भुंजीथा....। जो अकेले भोग करता है, धन-सम्पदा उसको ले डूबती है।






आज दशहरा है
राम आज रावण का वध करेंगे
देखो गांधी जी कहाँ हैं
उन्हें ये न बताना
वो अनशन कर देंगे
किसी का वध करना पाप है

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