
गाय हमारी माता है हम इसका दूध पीते है,, इसके दूध को पीकर हमें ताकत तो आती है मगर हमारे अंदर की sanstusti ख़तम नहीं होती ..हम इसको फाड़ कर इसका खून पीना चाहते है... हम पहले इसको लट्ठो से
मार मार कर नीचे गिरा देते है फिर हम इसके गले पर एक चीरा लगाते है ये चिलाते है हम खुश होते.... इसका बहता खून देख कर मन करता है जीभ निकाल कर चाट ले... थोड़ी देर में ये मर जाती है.. फिर हम इसको फाड़ कर इसका मॉस गूदा निकालते है...खाल काट कर अलग करते है.. इसके खुर भी काट देते है... इसको गरम गर्म पानी में धोते है.. फिर पकाते है.. हम इंसान है लेकिन हमारे अंदर एक जानवर बैठा है.. सोरी जानवर इतना पत्थर दिल नहीं होता
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