सोमवार, 3 अक्टूबर 2011
दिवाली की रात
दिवाली की रात
कहने को चार दिवारें अपनी थीं
काले चूने से पुती हुई,
पहली दिवाली की शाम,
न दिया न बाती,
न जान न पहचान,
ठंडा चुल्हा, घर में बिखरा सामान,
अंजान बाजारों में ढूढ़ती पूजा का सामान,
दुकानों की जगमग,
पटाखों का शोर,
सलीके से सजी दियों की पक्तियां,
मेरे घर से ज्यादा मेरे मन में अधेंरा भर रहीं थीं,
अकेलेपन की ठिठुरन, बोझिल कदम,
लौटते हुए माँ लक्ष्मी से बार बार माफी मांग रही थी,
प्रार्थना कर रही थी,
इस अधेंरे ठडें घर पर नजर डाले बिना ना निकल जाना,
लौटी तो देखा दरवाजे पर दो सुंदर से दियेअपनी पीली पीली आभा फैला रहे थे,
दो सुदंर सी कन्यांए सजी सवंरी,
हाथों में दियों की थाली लिये खड़ी मुस्करा कर बोलीं,
आंटी दिवाली मुबारक,
आश्चॅयचकित मैं,
हँस कर बोलीं हमारे यंहा रिवाज है,
अपना घर दियों से रौशन करने से पहले पड़ोसियों के घर जगमगाओ,
शत शत प्रणाम उन पूर्वजों को जिन्होंने ये रस्मों रिवाज बनाये,
शत शत प्रणाम उन बहुओं को जिन्होंने ये रस्मों रिवाज खुले मन से अपनाये
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