सोमवार, 3 अक्टूबर 2011


बड़ी छोटी

बड़ी छोटी

वो सावन की घटाएं,झूलों की ऊँची पींगे,
वो बेफिक्री के दिन,
लाल इमली के चटकारे, चूरण के चस्के,
वो गीटे के खेल,वो घर की रेलपेल,
छुट्टियों में चचेरी,मौसेरी बहनों का आना,
रात भर चादरों में छिप कर घुसर पुसर करना,
दबी दबी हंसी, चमकती आखें,
क्या बातें चल रहीं हैं,
कान लगाये, चुपके से दीदी के बिस्तर पर चढ़ती,
दीदी घुड़कती, जा यहाँ से, बड़ों के बीच नहीं बेठते
खिसियाई सी, रोनाई सी माँ के आँचल में सिमटती,
सुनने को बेकरार, माँ-मौसी कयुँ ठठाती,
घुड़कती आवाज,छोटे भैय्या के पास सोजा,
बड़ों की बातों में नहीं बेठते,
हाय, काश मैं बड़ी होती,
हंसती गाती, दीदी का काला चश्मा,
माँ की लिप्सटिक, माथे की बिन्दिया
मेरी हो जाती

वक्त के रेले ने ठेलठाल खड़ा कर ही दिया
अहा, अब मेरी बारी आई,
हाय, कहाँ गये सब लोग, उजड़े गुलशन हैं
छुट्टियाँ ही नहीं होतीं,
कौन सी क्लासेस,कौन सा कॉलेज,
नीड़ बस गए, जिदंगी हाथों से
रेत सी फिसल गयी
मन के किसी कोने में
अब भी झरना बहता है, कल कल छल छल,
पावों में थिरकन है, होठों पे गीत,
सावन की घटा कई पोर छू जाती है,
झाड़ियों के झुरमुट से आती घुसर पुसर,
क्या बातें हो रहीं हैं,
मन जानने को व्याकुल,
कुछ नहीं ऑंटी, आप जाओ ना,
हाय, काश मैं छोटी होती

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