सोमवार, 3 अक्टूबर 2011

बैरी मन


दुनिया के रेले, आते जाते लोग,

सड़क किनारे बैठे हम अकेले,

उड़ती सी नजर, ठिठके कदम,

जाते अपने रास्ते,

कौतुहल, खिलती मुस्कान,

दौस्ताना फ़ैले हाथ,

कछुए सी खुद में सिमटना,

कैसे भूलूँ,

वो सब कुछ कदम हम कदम,

कर गये मुझे,

अपने ही अधेंरों में गुम,

नीलकठं सा बैरी मन,

आज भी दूसरों की पीड़ा से

इसका गहराता नीला रंग,

हसीं की खनक से जब कोई

कछुए का खोल टकटकाता है,

तू सब भूल जाता है,

रस्सी छुड़ाए बैल सा बाहर निकल आता है,

कितना समझाया,

अब बस कर,

ये गिरने पड़ने का खेल,

अब इन हड्डियों में तेरी चोटें सहने की ताब कहाँ,

खुशी, इमानदारी सब कोरी मर्गतर्षणा हैं,

सच है सिर्फ़ धोखा, खुदगर्जी,

झूठ से प्यार कर,

खुशी मिले या न मिले,

चोट तो न खायेगा!!

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