सोमवार, 3 अक्टूबर 2011
एहसास
तेरी गरम बाहों को आज भी ओढ़ कर सोता हूँ मैं
तेरी सासों की महक से आज भी मदहोश होता हूँ मैं
तेरे केसुओं को आज भी अपनी उंगलियों से सहराता हूँ मैं
तेरी रूह के आइने में खुद को आज भी देख पाता हूँ मैं
तेरे जिस्म का एहसास आज भी वैसा ही बरकरार है
तेरे बदन की खुशबु से आज भी दिल की दुनिया गुलजार है
तेरे हाथ को अपनी दो हथैलियों में रख कर
निगाहों से हाले दिल सुनाने का सिलसिला भी जारी है
मेरी बेजुबान आखें तेरी सिलवटों का आइना बनकर
मुझे रोज सहर में झिंझोड के जगा देती है
मैं महसूस करता हूँ ये सब, इन एह्सास को जी नहीं पाता
फ़िर भी, वो एह्सास है जो जिन्दा है आज भी , सांस ले रहा है
काश हम थोड़ी देर और साथ जी पाते, तुम और मैं
खैर, इन एहसासों का मैं शुक्रिया कैसे करुं
कि तुम्हें अब तक मुझसे जोड़ के रखनेवाले वो ही तो हैं
ये एहसास ही तो है, जो हमको जोड़े रखेगें…हमेशा।
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