खुली वसीयत
खुली वसीयत
इसके पहले कि तालू से चिपके,
ये पटर पटर चलती जबां,सुन मेरी वसीयत बेटा बैठ यहां,
कुछ बातें तुझसे कहनी हैं,
जो मेरे मरने से पहले और मरने के बाद तुझे निभानी हैं,
जब जीवन धारा सूखने लगे, जबां न चले,
करवट मौह्ताजी हो, आखँ न खुले,
तुझसे मेरी विनती है,
इन रिसती सासों को सुइयों नलियों कि सजा न हो,
किसी की रोजी रोटी की तिक्कड़म का सामान न हो,
खिसका देना खटिया मेरी उस खिड़की के पास,नजरों से आलिंगन कर लूं अपनी अमराई का अंतिम बार,
मेरे गालों को चूमे मन्द मन्द ब्यार, ओड़ूं सावन की फ़ुहार,
दवाइयों की बदबू,ठ्डे लोहे के बिस्तर,ए सी की बासी हवा,
इन अटकी सासों को मत देना ये सजा,
छूटे सासें ,कटे सजा तो मेरी खुशियों में शामिल होना,
किसी अच्छे से होटल में सपरिवार स्वनिमत्रंण देना,
निर्जीव मिट्टी की खातिर जीवित पेड़ों की ह्त्या,
ये पाप न मेरे सर देना,
ये हरियाली भविष्य की धरोहर,मेरे लिए हुआ पराया,
न जलाना, न गाड़ना, न चील कऊऔं को खिलाना,
मुझसे न हो मैली हवा, माटी , ये नदिया,
किसी मेडिकल कोलेज में दे देना दान,
शिक्षक थी, शिक्षक हूँ,निभाऊँ मर कर भी शिक्षक धर्म
मेरे अंगों को चीर फ़ाड़ के जाने बच्चे मर्ज का मर्म,
जिस सखा से जीवन भर बतियाई हूँ,
उल्हाने दिए और मुस्काई हूँ,
उससे मिलने को पंडित के श्लोकों कि दरकार कहाँ,
न सहेजना दिवारों पर मेरे निशां,
तू मेरी जीवंत निशानी है, फ़ोटो में वो बात कहाँ,
न याद कभी करना मुझको, आगे बढ़ना सिखलाया तुझको,
ले चली हूँ बस मैं इन एहसासों को, इस मन्थन को,
जिसने जीवन भर सताया मुझको,
अब मेरी बारी आयी, सजाए-मौत देने की इनको
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