गुरुवार, 29 सितंबर 2011
दो दुकानदार आपस में बातचीत करते हुए पहला - तुम कैसे जान पाते हो कि माल लेने वाले ग्राहक पति-पत्नी हैं या प्रेमी-प्रेमिका ? दूसरा – यदि चुपचाप खरीदारी करें तो समझो प्रेमी-प्रेमिका हैं और यदि केवल मोल-तोल करते हुए आपस में झगडें तो समझ लो कि पति-पत्नी हैं…. !
बुधवार, 28 सितंबर 2011
क्या आप जानते है इंडिया का वह स्थान जहाँ सबसे सस्ता भोजन उपलब्ध है ? ............
चाय = 1 रूपया प्रति चाय
सूप = 5.50 रुपये
दाल = 1.50 रूपया
शाकाहारी थाली (जिसमे दाल, सब्जी 4 चपाती चावल/पुलाव, दही, सलाद ) = 12.50 रुपये
मांसाहारी थाली = 22 रुपये
दही चावल = 11 रुपये
शाकाहारी पुलाव = 8 रुपये
चिकेन बिरयानी = 34 रुपये
फिश कर्री और चावल = 13 रुपये
राजमा चावल = 7 रुपये
टमाटर चावल = 7 रुपये
फिश करी = 17 रुपये
चिकन करी = 20 .50 रुपये
चिकन मसाला = 24 .50 रुपये
बटर चिकन = 27 रुपये
चपाती = 1 रूपया प्रति चपाती
एक पलते चावल = 2 रुपये
डोसा = 4 रुपये
खीर = 5.50 रुपये प्रति कटोरी
फ्रूट केक = 9 .50 रुपये
फ्रूट सलाद = 7 रुपये
यह वास्तविक मूल्य सूची है
ऊपर
बताई गई सारी मदें " गरीब लोगों "केवल और केवल के लिए है जो कि भारत के
संसद की केन्टीन में ही उपलब्ध है. ............. और इन गरीब लोगों की
तनख्वाह 80,000 रुपये प्रति माह है . ......................... इसके अलावा
इन्हें बोनस के रूप में भारी से भारी घोटाले करके अरबों - खरबों रुपये
हडपने की खुल्ली छूट है .
.............. और ये सारा का सारा प
चाय = 1 रूपया प्रति चाय
सूप = 5.50 रुपये
दाल = 1.50 रूपया
शाकाहारी थाली (जिसमे दाल, सब्जी 4 चपाती चावल/पुलाव, दही, सलाद ) = 12.50 रुपये
मांसाहारी थाली = 22 रुपये
दही चावल = 11 रुपये
शाकाहारी पुलाव = 8 रुपये
चिकेन बिरयानी = 34 रुपये
फिश कर्री और चावल = 13 रुपये
राजमा चावल = 7 रुपये
टमाटर चावल = 7 रुपये
फिश करी = 17 रुपये
चिकन करी = 20 .50 रुपये
चिकन मसाला = 24 .50 रुपये
बटर चिकन = 27 रुपये
चपाती = 1 रूपया प्रति चपाती
एक पलते चावल = 2 रुपये
डोसा = 4 रुपये
खीर = 5.50 रुपये प्रति कटोरी
फ्रूट केक = 9 .50 रुपये
फ्रूट सलाद = 7 रुपये
यह वास्तविक मूल्य सूची है
ऊपर
बताई गई सारी मदें " गरीब लोगों "केवल और केवल के लिए है जो कि भारत के
संसद की केन्टीन में ही उपलब्ध है. ............. और इन गरीब लोगों की
तनख्वाह 80,000 रुपये प्रति माह है . ......................... इसके अलावा
इन्हें बोनस के रूप में भारी से भारी घोटाले करके अरबों - खरबों रुपये
हडपने की खुल्ली छूट है .
.............. और ये सारा का सारा प
गुजरात मे गौ हत्या पर 7 साल की कैद, 50 हजार जुर्माना
अहमदाबाद । गुजरात में गौ हत्या करने वालों की अब खैर नहीं। गुजरात सरकार ने गौ हत्या पर जुर्माने और सजा के नियमों को बेहद कड़ा कर दिया है। मंगलवार को इससे जुड़ा विधेयक सर्वसम्मति से विधानसभा में पारित कर दिया गया। इस विधेयक के मुताबिक गाय को हत्या के नीयत से ले जा रहे शख्स को 7 साल जेल हो सकती है। गौ हत्या को बैन करने वाले गुजरात एनिमल प्रेजर्वेशन ऐक्ट (जीएपीए) 1954 में इस इरादे से मवेशियों को ले जाते वक्त पकड़े जाने वालों पर कार्रवाई का कोई प्रावधान नहीं था। मंगलवार को गुजरात एनिमल प्रेजर्वेशन (संशोधित) बिल 2011 पेश करते हुए राज्य के कृषि मंत्री दिलीप संघानी ने कहा कि नए कानून में गौ हत्या के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़े प्रावधान किए गए हैं। इस विधेयक को विपक्षी कांग्रेस ने भी अपना समर्थन दिया है। इसके तहत गौ हत्या पर 6 माह की सजा को बढ़ाकर 7 साल और जुर्माना 1,000 से बढ़ाकर 50,000 रुपये कर दिया गया है। नए विधेयक में हत्या के मकसद से गायों को ले जा रहे वाहन को भी जब्त करने का प्रावधान किया गया है। कृषि कार्य या पालन के उद्देश्य से मवेशियों को एक से दूसरी जगह ले जाने के लिए पूर्व अनुमति लेनी पड़ेगी। दूसरी तरफ विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्ष के नेता शक्ति सिंह गोहिल ने कहा कि मालधारी समुदाय के बीच सरकार के प्रति गुस्सा है। गोहिल के मुताबिक 1980 में राज्य में जहां 3,32,000 हेक्टेयर भूमि गायों के चरागाह के तौर पर मौजूद थी जो एक साल पहले तक सिकुड़ कर बेहद कम रह गई है। सरकार ने इसमें से ज्यादातर जमीन उद्योगपतियों को बेच दी है।वाह नरेन्दरमोदीजी आपकी तो तारीफ करे जीतनी कम हे
आपको भगवान हमेशा सुखी रखे
नवरात्रि के नौ रातो में तीन हिंदू देवियों - पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं ।
नौ देवियाँ है :-
* श्री शैलपुत्री
* श्री ब्रह्मचारिणी
* श्री चंद्रघंटा
* श्री कुष्मांडा
* श्री स्कंदमाता
* श्री कात्यायनी
* श्री कालरात्रि
* श्री महागौरी
* श्री सिद्धिदात्री
नौ देवियाँ है :-
* श्री शैलपुत्री
* श्री ब्रह्मचारिणी
* श्री चंद्रघंटा
* श्री कुष्मांडा
* श्री स्कंदमाता
* श्री कात्यायनी
* श्री कालरात्रि
* श्री महागौरी
* श्री सिद्धिदात्री
मंगलवार, 27 सितंबर 2011
सभी भाइयो से निवेदन हे की इस बार गरबा के अंदर जरुर भाग लेवे ||
सभी भाइयो से निवेदा हे की इस त्योर को धूम धाम से मनाये |
जय माता दी की और से आप सभी को नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाए
जय माता दी

जय माँ नवरात्री

जय माँ दुर्गा


हा दोस्तों मेरी तरफ से आपको नवरात्री की शुभकामनाये
आप सभी सदा सुख रहे
जय माँ जगदम्बा भवानी की जय हो
सभी भाइयो से निवेदन हे की कोई भी गलत स्क्रैप न भेजो न ही विडियो भेजे अगर आप एइसी हरकत करेंगे तो में उसको हमेसा के लिए बहार कर दूँगा और उसकी g mail craim बरांच में कोम्प्लेट कर दूँगा जो आपकी मेल आईडी को ब्लॉग कर देंगे
सोमवार, 26 सितंबर 2011
सीरवी भाइयो से निवेदन हे की नवरात्री की गरबा धूम धाम से मनाये
सभी भाइयो को नवरात्रि की शुभ कामनाये||
जय माँ अम्बे

जय माँ दुर्गा

जय माँ भवानी
उल्लुओं और चमगादड़ों की
नजर भी अब कहने लगी है
उलटी है, ये दुनिया सीधी कैसे हो
जंगल की इस सभा में
शेर चीते बहुत कम थे
... गधे सिर्फ मौजूद थे
कुत्तों ने भी बहुत सोचा
पर अपनी गली के सिवा
भौंकने का तजुर्बा न था
नीतिज्ञ थे ,देख एक बोटी
दुम हिलाने लगे
मोरों ने बांधे तो थे, पाँव में घुंघरू
इस जंगल में बारिश न हुई
जंगल के कानून में
जीत किसी वोट से न हुई
शाम की दावत में
बलि फिर किसी मेमने की हुई
नजर भी अब कहने लगी है
उलटी है, ये दुनिया सीधी कैसे हो
जंगल की इस सभा में
शेर चीते बहुत कम थे
... गधे सिर्फ मौजूद थे
कुत्तों ने भी बहुत सोचा
पर अपनी गली के सिवा
भौंकने का तजुर्बा न था
नीतिज्ञ थे ,देख एक बोटी
दुम हिलाने लगे
मोरों ने बांधे तो थे, पाँव में घुंघरू
इस जंगल में बारिश न हुई
जंगल के कानून में
जीत किसी वोट से न हुई
शाम की दावत में
बलि फिर किसी मेमने की हुई
जरा सोचिये ..... (बच्चो को हम क्या देंगे ... इस्लामी हुकूमत)
1 मुसलमान
4 शादी
18 बच्चे
30 रोजे
57 देश
2 लाख मदरसे
60 लाख आतंकवादी
150 करोड जन्सख्या
और मिशन सिर्फ एक ........ "हिन्दोस्तान पर अधिकार"
.
और हिंदू
में और मेरा परिवार
परिवार भी कितना...
हम 2 हमारे 2 , नहीं नहीं अब तो 1 ही
.
ज़रा सोचिये ......
बच्चो को हम क्या देंगे ....... ""इस्लामी हुकूमत""
कृपया अपनी वाल अपने समूह में पोस्ट करे ... हिन्दू , भारत हित में जारी
1 मुसलमान
4 शादी
18 बच्चे
30 रोजे
57 देश
2 लाख मदरसे
60 लाख आतंकवादी
150 करोड जन्सख्या
और मिशन सिर्फ एक ........ "हिन्दोस्तान पर अधिकार"
.
और हिंदू
में और मेरा परिवार
परिवार भी कितना...
हम 2 हमारे 2 , नहीं नहीं अब तो 1 ही
.
ज़रा सोचिये ......
बच्चो को हम क्या देंगे ....... ""इस्लामी हुकूमत""
कृपया अपनी वाल अपने समूह में पोस्ट करे ... हिन्दू , भारत हित में जारी
जिस भारत में कभी दूध की नदियाँ बहती थी,जहाँ का पेय दूध,दही,मटठा,शिकंजी,नारियल पानी और फलों का रस था, उसी भारत में अब शीतल पेय की कम्पनियों की वजह से शुद्ध जल मिलना भी दुर्भर होता जा रहा है। यह रसायन पेय मानव शरीर के लिए कितना हानिकारक है इसका अहसास उपयोग करने वाले को तुरंत नहीं होता है। इन शीतल पेय की कंपनियों के अनुसार इनमें --फॉस्फोरिक एसिड ,एस्प्रेटम(मेथाइल इस्टर)एसबुल्झे पोटेशियम,सोडियम बांजोएट,आदि रसायन मिलाए जाते हैं। इनमें चटपटा तीखापन लाने के लिए फास्फ़ोरिक और साइट्रिक एसिड का प्रयोग किया जाता है----फासफ़ोरिक एसिड की ज़्यादा मात्रा हमारे शरीर में कैल्शियम फास्फ़ोरस के अनुपात को बिगड़ देती है। इस से हड़ियाँ कमजोर होती हैं ,जोड़ो मे दर्द जैसे ख़तरनाक रोग का ख़तरा रहता है एस्प्रेटम से कैंसर और ब्रेन हैमरेज का ख़तरा रहता है। विज्ञान और पर्यावरण केंद्र भी कोक और पेप्सी की 12 ब्रांड मे ज़हरीले कीटनाशक होने की रिपोर्ट दे चुका है.............निर्णय आपका जिंदगी आपकी ...........जागो भारत जागो
श्री श्रीराजाधिराज द्वारिकाधीश जी महाराज, मथुरा
मंगला में गाई जाने वाली प्रार्थना
संसार के प्राण आधार हो तुम, श्री कृष्ण तुम्हारी जय होवे !
महि भार उतारन हार हो तुम ,श्री कृष्ण तुम्हारी जय होवे !!
प्रभु दीन हूँ मैं बलहीन हूँ मैं, धनहीन हूँ मैं आधीन हूँ मैं !
इस जीवन के आधार हो तुम, श्री कृष्ण तुम्हारी जय होवे !!
संसार के प्राण आधार हो तुम, श्री कृष्ण तुम्हारी जय होवे !
महि भार उतारन हार हो तुम ,श्री कृष्ण तुम्हारी जय होवे !!
गज के हित नंगे पाँव भजे, द्रोपती हित वस्त्र तमाम तजे !
जन लाज बचावन हार हो तुम, श्री कृष्ण तुम्हारी जय होवे !!
संसार के प्राण आधार हो तुम, श्री कृष्ण तुम्हारी जय होवे !
महि भार उतारन हार हो तुम ,श्री कृष्ण तुम्हारी जय होवे !!
करते हैं अरज यही सद्दा, मन व्याधि विकार न हो पैदा !
करते सबका उद्धार हो तुम, श्री कृष्ण तुम्हारी जय होवे !!
संसार के प्राण आधार हो तुम, श्री कृष्ण तुम्हारी जय होवे !
महि भार उतारन हार हो तुम ,श्री कृष्ण तुम्हारी जय होवे !!
ये जो प्यार भरी सौगाते हैं
ये सारी झूठी बातें है
सपने ये बहुत दिखाते है
फिर बीच राह बहकाते है
ये सपनो के सौदागर है
सपने अपने दिखलाते है
फिर सोम पान करवाते है
ये जो प्यार भरी सौगाते हैं
ये सारी झूठी बातें है
ये अपनों से लड़वाते हैं
मित्रो को शत्रु बनवाते हैं
ये जो प्यार भरी सौगाते हैं
ये सारी झूठी बातें है.
ये सारी झूठी बातें है
सपने ये बहुत दिखाते है
फिर बीच राह बहकाते है
ये सपनो के सौदागर है
सपने अपने दिखलाते है
फिर सोम पान करवाते है
ये जो प्यार भरी सौगाते हैं
ये सारी झूठी बातें है
ये अपनों से लड़वाते हैं
मित्रो को शत्रु बनवाते हैं
ये जो प्यार भरी सौगाते हैं
ये सारी झूठी बातें है.
फल वाला बेच रहा था अंगूर
चिल्ला रहा था आलू
मैं उससे भी जोर से चिल्लाया
बेचता है फल, चिल्लाता आलू
गिड़गिड़ाने लगा फल वाला
वो जी घोटाले में नहीं था जी
मक्खियों को दे रहा हूं चकमा
हिंदी समझ लेती हैं न वे भी।
चिल्ला रहा था आलू
मैं उससे भी जोर से चिल्लाया
बेचता है फल, चिल्लाता आलू
गिड़गिड़ाने लगा फल वाला
वो जी घोटाले में नहीं था जी
मक्खियों को दे रहा हूं चकमा
हिंदी समझ लेती हैं न वे भी।
तुम आंसू बहाकर
लक्ष्य से पीछे न हटाना
इरादें हो मजबूत
तो लक्ष्य पा लोगे
आँखों में नूर भर कर
लक्ष्य को सीधे सामने देखो
जिंदगी के हर मोड़ पर है
प्रतीस्पर्धा और भाग्दोड
तुम्हारा रक ही लक्ष्य हो
आगे बढने का
कुछ कर दीखाने का
लक्ष्य के लिए साधन करो
हार का नाम ही
जीन्दगी हे
हार कर ही
जीतना होगा
तुम न रहो पीछे
आगे रहो हमेशा
आगे बढ़ना होगा
जिन्दगी तो भरी पड़ी है
काँटों से
लक्ष्य पाने के लिए
काँटों पर चलना होगा
काँटों को फूल बनना होगा
खुशिया पाना होगा
खुशिया बाटना होगा /
लक्ष्य से पीछे न हटाना
इरादें हो मजबूत
तो लक्ष्य पा लोगे
आँखों में नूर भर कर
लक्ष्य को सीधे सामने देखो
जिंदगी के हर मोड़ पर है
प्रतीस्पर्धा और भाग्दोड
तुम्हारा रक ही लक्ष्य हो
आगे बढने का
कुछ कर दीखाने का
लक्ष्य के लिए साधन करो
हार का नाम ही
जीन्दगी हे
हार कर ही
जीतना होगा
तुम न रहो पीछे
आगे रहो हमेशा
आगे बढ़ना होगा
जिन्दगी तो भरी पड़ी है
काँटों से
लक्ष्य पाने के लिए
काँटों पर चलना होगा
काँटों को फूल बनना होगा
खुशिया पाना होगा
खुशिया बाटना होगा /
रविवार, 25 सितंबर 2011
सारा देश हमारा
केरल से करगिल घाटी तक
गौहाटी से चौपाटी तक
सारा देश हमारा
जीना हो तो मरना सीखो
गूँज उठे यह नारा -
केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा,
लगता है ताज़े लोहू पर जमी हुई है काई
लगता है फिर भटक गई है भारत की तरुणाई
काई चीरो ओ रणधीरों!
ओ जननी की भाग्य लकीरों
बलिदानों का पुण्य मुहूरत आता नहीं दुबारा
जीना हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा -
केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा,
घायल अपना ताजमहल है, घायल गंगा मैया
टूट रहे हैं तूफ़ानों में नैया और खिवैया
तुम नैया के पाल बदल दो
तूफ़ानों की चाल बदल दो
हर आँधी का उत्तर हो तुम, तुमने नहीं विचारा
जीना हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा -
केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा,
कहीं तुम्हें परबत लड़वा दे, कहीं लड़ा दे पानी
भाषा के नारों में गुप्त है, मन की मीठी बानी
आग लगा दो इन नारों में
इज़्ज़त आ गई बाज़ारों में
कब जागेंगे सोये सूरज! कब होगा उजियारा
जीना हो तो मरना सीखो, गूँज उठे यह नारा -
केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा
संकट अपना बाल सखा है, इसको कठ लगाओ
क्या बैठे हो न्यारे-न्यारे मिल कर बोझ उठाओ
भाग्य भरोसा कायरता है
कर्मठ देश कहाँ मरता है?
सोचो तुमने इतने दिन में कितनी बार हुँकारा
जीना हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा
केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा
केरल से करगिल घाटी तक
गौहाटी से चौपाटी तक
सारा देश हमारा
जीना हो तो मरना सीखो
गूँज उठे यह नारा -
केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा,
लगता है ताज़े लोहू पर जमी हुई है काई
लगता है फिर भटक गई है भारत की तरुणाई
काई चीरो ओ रणधीरों!
ओ जननी की भाग्य लकीरों
बलिदानों का पुण्य मुहूरत आता नहीं दुबारा
जीना हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा -
केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा,
घायल अपना ताजमहल है, घायल गंगा मैया
टूट रहे हैं तूफ़ानों में नैया और खिवैया
तुम नैया के पाल बदल दो
तूफ़ानों की चाल बदल दो
हर आँधी का उत्तर हो तुम, तुमने नहीं विचारा
जीना हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा -
केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा,
कहीं तुम्हें परबत लड़वा दे, कहीं लड़ा दे पानी
भाषा के नारों में गुप्त है, मन की मीठी बानी
आग लगा दो इन नारों में
इज़्ज़त आ गई बाज़ारों में
कब जागेंगे सोये सूरज! कब होगा उजियारा
जीना हो तो मरना सीखो, गूँज उठे यह नारा -
केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा
संकट अपना बाल सखा है, इसको कठ लगाओ
क्या बैठे हो न्यारे-न्यारे मिल कर बोझ उठाओ
भाग्य भरोसा कायरता है
कर्मठ देश कहाँ मरता है?
सोचो तुमने इतने दिन में कितनी बार हुँकारा
जीना हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा
केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा
माँ से यही तो मांगना है!
*********************************************************************************
एक स्तुति जो मेरे ह्रदय में कभी उपजी थी
सरस्वती वन्दना-
हे माँ
विद्यावरदायिनी
वीणा पुस्तकधारिणी
मुझे सदज्ञान दो।
सदा जीवन के पथ पर सतमार्ग दो।
सदा हम ज्ञान के पथ पर चले।
ऐसा हमें वरदान दो॥
सदभावना सत्कर्म और सत्संग को प्रेरित रहें।
सदा मानव जाति में अध्यात्म से पोषित रहें
सदमार्ग में आये अगर बाधा कोई
फ़िर भी कभी सतमार्ग से विचलित न हो॥
हे माँ..............
हे माँ मुझे ज्ञान से विज्ञान से पोषित करो
मस्तिष्क में तुम ज्ञान दो शिव की तरह
जीवन के पथ पर कर्म दो तुम कृष्ण का
आदर्शता दो तुम हमें प्रभु राम की॥
हमको विलक्षण ज्ञान की तुम ज्योति दो
इस ज्योति से कर दू प्रज्ज्वलित धर्म को
ऐसा मुझे अभ्यास दो॥
सभ्यता जीवित रहे मुझ में सदा
ऐसा मुझे वरदान दो॥
*********************************************************************************
एक स्तुति जो मेरे ह्रदय में कभी उपजी थी
सरस्वती वन्दना-
हे माँ
विद्यावरदायिनी
वीणा पुस्तकधारिणी
मुझे सदज्ञान दो।
सदा जीवन के पथ पर सतमार्ग दो।
सदा हम ज्ञान के पथ पर चले।
ऐसा हमें वरदान दो॥
सदभावना सत्कर्म और सत्संग को प्रेरित रहें।
सदा मानव जाति में अध्यात्म से पोषित रहें
सदमार्ग में आये अगर बाधा कोई
फ़िर भी कभी सतमार्ग से विचलित न हो॥
हे माँ..............
हे माँ मुझे ज्ञान से विज्ञान से पोषित करो
मस्तिष्क में तुम ज्ञान दो शिव की तरह
जीवन के पथ पर कर्म दो तुम कृष्ण का
आदर्शता दो तुम हमें प्रभु राम की॥
हमको विलक्षण ज्ञान की तुम ज्योति दो
इस ज्योति से कर दू प्रज्ज्वलित धर्म को
ऐसा मुझे अभ्यास दो॥
सभ्यता जीवित रहे मुझ में सदा
ऐसा मुझे वरदान दो॥
शाम ढलने वाली है सोचते हैं घर जाएँ
फिर खयाल आता है किस तरफ़ किधर जाएँ
दूसरे किनारे प’ तीसरा न हो कोई
फिर तो हम भी दरिया में बे- खतर उतर जाएँ
हिज़रती परिन्दों का कुछ यकीं नहीं होता
कब हवा का रुख बदले कब ये कूच कर जाएँ
धूप के मुसाफ़िर भी क्या अजब मुसाफ़िर हैं
साए में ठहर कर ये साए से ही डर जाएँ
फिर खयाल आता है किस तरफ़ किधर जाएँ
दूसरे किनारे प’ तीसरा न हो कोई
फिर तो हम भी दरिया में बे- खतर उतर जाएँ
हिज़रती परिन्दों का कुछ यकीं नहीं होता
कब हवा का रुख बदले कब ये कूच कर जाएँ
धूप के मुसाफ़िर भी क्या अजब मुसाफ़िर हैं
साए में ठहर कर ये साए से ही डर जाएँ
शनिवार, 24 सितंबर 2011
ऋग्वेद कहता है कि ईश्वर एक है किन्तु दृष्टिभेद से मनीषियों ने उसे भिन्न-भिन्न नाम दे रखा है । जैसे एक ही व्यक्ति दृष्टिभेद के कारण परिवार के लोगों द्वारा पिता, भाई, चाचा, मामा, फूफा, दादा, बहनोई, भतीजा, पुत्र, भांजा, पोता, नाती आदि नामों से संबोधित होता है, वैसे ही ईश्वर भी भिन्न-भिन्न कर्ताभाव के कारण अनेक नाम वाला हो जाता है । यथा-
जिस रूप में वह सृष्टिकर्ता है वह ब्रह्मा कहलाता है ।
जिस रूप में वह विद्या का सागर है उसका नाम सरस्वती है ।
जिस रूप में वह सर्वत्र व्याप्त है या जगत को धारण करने वाला है उसका नाम विष्णु है ।
जिस रूप में वह समस्त धन-सम्पत्ति और वैभव का स्वामी है उसका नाम लक्ष्मी है ।
जिस रूप में वह संहारकर्ता है उसका नाम रुद्र है ।
जिस रूप में वह कल्याण करने वाला है उसका नाम शिव है ।
जिस रूप में वह समस्त शक्ति का स्वामी है उसका नाम पार्वती है, दुर्गा है ।
जिस रूप मे वह सबका काल है उसका नाम काली है ।
जिस रूप मे वह सामूहिक बुद्धि का परिचायक है उसका नाम गणेश है ।
जिस रूप में वह पराक्रम का भण्डार है उसका नाम स्कंद है ।
जिस रूप में वह आनन्ददाता है, मनोहारी है उसका नाम राम है ।
जिस रूप में वह धरती को शस्य से भरपूर करने वाला है उसका नाम सीता है ।
जिस रूप में वह सबको आकृष्ट करने वाला है, अभिभूत करने वाला है उसका नाम कृष्ण है ।
जिस रूप में वह सबको प्रसन्न करने, सम्पन्न करने और सफलता दिलाने वाला है उसका नाम राधा है ।
लोग अपनी रुचि के अनुसार ईश्वर के किसी नाम की पूजा करते हैं । एक विद्यार्थी सरस्वती का पुजारी बन जाता है, सेठ-साहूकार को लक्ष्मी प्यारी लगती है । शक्ति के उपासक की दुर्गा में आस्था बनती है । शैव को शिव और वैष्णव को विष्णु नाम प्यारा लगता है । वैसे सभी नामों को हिन्दू श्रद्धा की दृष्टि से स्मरण करता है ।
जिस रूप में वह सृष्टिकर्ता है वह ब्रह्मा कहलाता है ।
जिस रूप में वह विद्या का सागर है उसका नाम सरस्वती है ।
जिस रूप में वह सर्वत्र व्याप्त है या जगत को धारण करने वाला है उसका नाम विष्णु है ।
जिस रूप में वह समस्त धन-सम्पत्ति और वैभव का स्वामी है उसका नाम लक्ष्मी है ।
जिस रूप में वह संहारकर्ता है उसका नाम रुद्र है ।
जिस रूप में वह कल्याण करने वाला है उसका नाम शिव है ।
जिस रूप में वह समस्त शक्ति का स्वामी है उसका नाम पार्वती है, दुर्गा है ।
जिस रूप मे वह सबका काल है उसका नाम काली है ।
जिस रूप मे वह सामूहिक बुद्धि का परिचायक है उसका नाम गणेश है ।
जिस रूप में वह पराक्रम का भण्डार है उसका नाम स्कंद है ।
जिस रूप में वह आनन्ददाता है, मनोहारी है उसका नाम राम है ।
जिस रूप में वह धरती को शस्य से भरपूर करने वाला है उसका नाम सीता है ।
जिस रूप में वह सबको आकृष्ट करने वाला है, अभिभूत करने वाला है उसका नाम कृष्ण है ।
जिस रूप में वह सबको प्रसन्न करने, सम्पन्न करने और सफलता दिलाने वाला है उसका नाम राधा है ।
लोग अपनी रुचि के अनुसार ईश्वर के किसी नाम की पूजा करते हैं । एक विद्यार्थी सरस्वती का पुजारी बन जाता है, सेठ-साहूकार को लक्ष्मी प्यारी लगती है । शक्ति के उपासक की दुर्गा में आस्था बनती है । शैव को शिव और वैष्णव को विष्णु नाम प्यारा लगता है । वैसे सभी नामों को हिन्दू श्रद्धा की दृष्टि से स्मरण करता है ।
=भूल करने में पाप तो है ही, परन्तु उसे छिपाने में उससे भी बड़ा पाप है। -महात्मा गांधी
=अपनी भूल अपने ही हाथों से सुधर जाए तो यह इससे कहीं अच्छा है कि कोई दूसरा उसे सुधारे। - प्रेमचन्द
=गलती तो हर मनुष्य कर सकता है, किन्तु उस पर दृढ़ केवल मूर्ख ही होते हैं। -सिरसो
=अंधा वह नहीं जिसकी आँख फूट गई है, अंधा वह जो अपने दोष ढंकता है। -महात्मा गांधी
=जो जीना नहीं जानता है वह मरना कैसे जाने ? -महात्मा गांधी
=नम्रता का ढोंग नहीं चलता, न सादगी का। -महात्मा गांधी
=व्यक्ति दौलत से नहीं, ज्ञान से अमीर होता है।
=झूठ इन्सान को अंदर से खोखला बना देता है।
=संसार में सब से दयनीय कौन है? धनवान होकर भी जो कंजूस है। -विद्यापति
=अपनी भूल अपने ही हाथों से सुधर जाए तो यह इससे कहीं अच्छा है कि कोई दूसरा उसे सुधारे। - प्रेमचन्द
=गलती तो हर मनुष्य कर सकता है, किन्तु उस पर दृढ़ केवल मूर्ख ही होते हैं। -सिरसो
=अंधा वह नहीं जिसकी आँख फूट गई है, अंधा वह जो अपने दोष ढंकता है। -महात्मा गांधी
=जो जीना नहीं जानता है वह मरना कैसे जाने ? -महात्मा गांधी
=नम्रता का ढोंग नहीं चलता, न सादगी का। -महात्मा गांधी
=व्यक्ति दौलत से नहीं, ज्ञान से अमीर होता है।
=झूठ इन्सान को अंदर से खोखला बना देता है।
=संसार में सब से दयनीय कौन है? धनवान होकर भी जो कंजूस है। -विद्यापति
शुक्रवार, 23 सितंबर 2011
मैंने जिंदगी को देखा है....
उसकी चमकती आँखों में, खिलखिलाती हसी में ...
उसकी चेहरे की मासूमियत में,शरारती बातों में
उसके अल्ल्हड़पन में, उसके नजाकत में
जिंदगी जैसे खुद सांस ले रही हो
... उसकी हर एक अदा में
मैंने एक जिंदगी को ..एक जिंदगीसे
गले मिलते देखा है
हां.......मैंने जिंदगी को देखा है.....
---------------------
उसकी चमकती आँखों में, खिलखिलाती हसी में ...
उसकी चेहरे की मासूमियत में,शरारती बातों में
उसके अल्ल्हड़पन में, उसके नजाकत में
जिंदगी जैसे खुद सांस ले रही हो
... उसकी हर एक अदा में
मैंने एक जिंदगी को ..एक जिंदगीसे
गले मिलते देखा है
हां.......मैंने जिंदगी को देखा है.....
---------------------
आज अन्ना आडवाणी की रथयात्रा से मतभेद रख रहे हैं
कल बाबा रामदेव के आंदोलन से मतभेद थे
शायद अन्ना भूल गए की यही भाजपा कंधे से कंधा मिलकर आंदोलन में उनके साथ थी
हर शहर का भाजपा कार्यकर्ता अन्ना के आंदोलन में उनके साथ गिरफ्तारियां दे रहा था
रामलीला मैदान में भाजपाई और संघ के स्वयं सेवक व्यवस्थाओं में जुटे हुए थे
हाँ अन्ना को यह जरूर याद है की भाजपा किसी भी प्रकार से कोई भी आंदोलन नहीं कर पाए जिससे की जनता की नजरों में उसकी एक अच्छी छवि बन पाए
अन्ना जी आडवानी जी राम मंदिर के लिए रथ यात्रा नहीं कर रहे हैं जो आप उसका विरोध कर रहे हैं .. वो भ्रष्टाचार के खिलाफ रथयात्रा कर रहे हैं .. जिसमे की आपको भी अपना समर्थन देना चाहिए जैसे की भाजपा ने आपको दिया था
अन्ना कहते हैं की रथयात्रा नहीं पदयात्रा करें
शायद अन्ना को यह मालूम नहीं की रथयात्रा पदयात्रा ही होती है
उसमे लोग पैदल पैदल ही चलते हैं
सिर्फ इस शहर से उस शहर जाने के लिए वाहन का प्रयोग होता है
सिर्फ इस बात से रथयात्रा का विरोध करना कितना तार्किक है अन्ना जी ?
भूख से लोगों के मरने और रथयात्रा करने को क्यों जोड़ रहे हैं
अगर ऐसी बात है तो भारत में किसी भी प्रकार का कार्यक्रम नहीं होना चाहिए
क्रिकेट का खेल भी बंद हो जाना चाहिये
क्यूंकि एक तरफ तो भारत में लोग भूख से मरते हैं और एक तरफ लोग क्रिकेट का आनंद लेते रहते हैं
सिनेमा भी बंद हो जाना चाहिए
कुछ दिनों बाद लगता है अन्ना यह कहेंगे की कांग्रेस को वोट दो
क्यूंकि भाजपा सिर्फ राजनेतिक फायदे उठाती है
अन्ना कह रहे हैं की “हम भूमि अधिग्रहण बिल और अन्य जरूरी मुद्दों को लेकर भी आंदोलन करेंगे।”
भूमि अधिग्रहण बिल का नाम इसलिए लिया गया कहा है क्यूंकि यह अभी हॉट मुद्दा है
अन्ना कहते हैं “आंदोलन के समय देश की जनता खडी़ हो गई। इसमें कोई संगठन नहीं था।”
शायद अन्ना को मालूम नहीं की भाजपा और आर एस एस जो की उनके आंदोलन को शहर शहर में चला रहे थे वे एक संगठन है।
अन्ना कहते हैं की “हम अपने साथ जोड़ने से पहले लोगों के चरित्र की भी जांच करेंगे। हमारी टीम इस बात की पूरी परख करेगी की जो लोग हमारे साथ जुड़ रहे हैं उनका ट्रैक रिकार्ड कैसा है।”
जैसे की उन्होंने अग्निवेश की जांच की थी
जैसे की शांति भूषण की जाँच कर रखी थी
क्या आप जानते हैंकि अन्ना ने आखिरी बार कांग्रेस को कब टारगेट किया था ?
क्या आप जानते हैं की अन्ना एवं उनकी टीम आजकल रोज भाजपा को टारगेट कर रही है?
कल बाबा रामदेव के आंदोलन से मतभेद थे
शायद अन्ना भूल गए की यही भाजपा कंधे से कंधा मिलकर आंदोलन में उनके साथ थी
हर शहर का भाजपा कार्यकर्ता अन्ना के आंदोलन में उनके साथ गिरफ्तारियां दे रहा था
रामलीला मैदान में भाजपाई और संघ के स्वयं सेवक व्यवस्थाओं में जुटे हुए थे
हाँ अन्ना को यह जरूर याद है की भाजपा किसी भी प्रकार से कोई भी आंदोलन नहीं कर पाए जिससे की जनता की नजरों में उसकी एक अच्छी छवि बन पाए
अन्ना जी आडवानी जी राम मंदिर के लिए रथ यात्रा नहीं कर रहे हैं जो आप उसका विरोध कर रहे हैं .. वो भ्रष्टाचार के खिलाफ रथयात्रा कर रहे हैं .. जिसमे की आपको भी अपना समर्थन देना चाहिए जैसे की भाजपा ने आपको दिया था
अन्ना कहते हैं की रथयात्रा नहीं पदयात्रा करें
शायद अन्ना को यह मालूम नहीं की रथयात्रा पदयात्रा ही होती है
उसमे लोग पैदल पैदल ही चलते हैं
सिर्फ इस शहर से उस शहर जाने के लिए वाहन का प्रयोग होता है
सिर्फ इस बात से रथयात्रा का विरोध करना कितना तार्किक है अन्ना जी ?
भूख से लोगों के मरने और रथयात्रा करने को क्यों जोड़ रहे हैं
अगर ऐसी बात है तो भारत में किसी भी प्रकार का कार्यक्रम नहीं होना चाहिए
क्रिकेट का खेल भी बंद हो जाना चाहिये
क्यूंकि एक तरफ तो भारत में लोग भूख से मरते हैं और एक तरफ लोग क्रिकेट का आनंद लेते रहते हैं
सिनेमा भी बंद हो जाना चाहिए
कुछ दिनों बाद लगता है अन्ना यह कहेंगे की कांग्रेस को वोट दो
क्यूंकि भाजपा सिर्फ राजनेतिक फायदे उठाती है
अन्ना कह रहे हैं की “हम भूमि अधिग्रहण बिल और अन्य जरूरी मुद्दों को लेकर भी आंदोलन करेंगे।”
भूमि अधिग्रहण बिल का नाम इसलिए लिया गया कहा है क्यूंकि यह अभी हॉट मुद्दा है
अन्ना कहते हैं “आंदोलन के समय देश की जनता खडी़ हो गई। इसमें कोई संगठन नहीं था।”
शायद अन्ना को मालूम नहीं की भाजपा और आर एस एस जो की उनके आंदोलन को शहर शहर में चला रहे थे वे एक संगठन है।
अन्ना कहते हैं की “हम अपने साथ जोड़ने से पहले लोगों के चरित्र की भी जांच करेंगे। हमारी टीम इस बात की पूरी परख करेगी की जो लोग हमारे साथ जुड़ रहे हैं उनका ट्रैक रिकार्ड कैसा है।”
जैसे की उन्होंने अग्निवेश की जांच की थी
जैसे की शांति भूषण की जाँच कर रखी थी
क्या आप जानते हैंकि अन्ना ने आखिरी बार कांग्रेस को कब टारगेट किया था ?
क्या आप जानते हैं की अन्ना एवं उनकी टीम आजकल रोज भाजपा को टारगेट कर रही है?
जोधपुर। एएनएम भंवरी देवी के अपहरण के चर्चित मामले में हाईकोर्ट ने पुलिस जांच पर गहरा असंतोष व्यक्त किया है। कोर्ट ने प्रकरण के जांच अघिकारी हिम्मत अभिलाष टाक को भी गुरूवार को कड़ी फटकार लगाई। साथ ही जोधपुर रेंज के आईजी उमेश मिश्रा को 26 सितम्बर को हाईकोर्ट में उपस्थित रहने के आदेश दिए। न्यायाधीश संगीत लोढ़ा एवं चांदमल तोतला की खण्डपीठ ने भंवरी के पति अमरचंद नट की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान यह आदेश पारित किया।
पुलिस नहीं है गंभीर
याचिकाकर्ता के वकील संदीप शाह का कहना था कि पुलिस जांच में कतई गंभीर नहीं है। आरोपियों के नाम स्पष्ट होने के बावजूद उनकी गिरफ्तारी के ठोस प्रयास नहीं किए जा रहे। पुलिस अफसरों ने आरोपियों को पकड़वाने पर इनाम घोषित करके कर्तव्य की इतिश्री कर ली। अघिवक्ता शाह व उनके सहयोगियों ने बड़े लोगों का हाथ बताते कोर्ट से दखल व भंवरी का पता लगाने को जांच अघिकारियों को पाबंद करवाने का अनुरोध किया।
सरकारी वकीलों की मांग ठुकराई
इसके विपरीत जांच अघिकारी हिम्मत अभिलाष, सरकारी वकील बरकत खान एवं प्रद्युम्नसिंह ने अदालत को बताया कि पुलिस ने इस प्रकरण के संदिग्ध शहाबुद्दीन, कुम्भाराम उर्फ बलदेव व सहीराम विनोई की तलाश शुरू कर दी है। आरोपी सोहनलाल विश्नोई पुलिस की गिरफ्त में है। भंवरी की तलाश के लिए 13 दल गठित किए हैं। उन्होंने अदालत से दो सप्ताह का वक्त मांगा, लेकिन पुलिस जांच की धीमी गति और अनुसंधान में विभिन्न कमियों को लेकर नाराज हाईकोर्ट ने सरकारी वकीलों की यह प्रार्थना ठुकरा दी।
क्या पुलिस नकारा है!
न्यायाधीश लोढ़ा ने अनुसंधान में कमियों व पुलिस के गंभीर नहीं होने पर कड़ी मौखिक टिप्पणी की। कहा, प्रकरण में सीबीआई जांच का प्रस्ताव कहां से आया? क्या राजस्थान पुलिस 'इनकॉम्पीटेंट' है!
ऎसे तो पूरे देश में घूम लो, क्या होगा
(अदालत की मौखिक टिप्पणियां)
शहाबुद्दीन गांव में नहीं है। फिर भी चार बार टीम उसके गांव ही भेजी। इससे क्या होगा!पुलिस अनुसंधान का 'क्लू' क्या है!ऎसे तो पूरे हिंदुस्तान में घूमो। उससे क्या होगा!
महीनों तक कॉर्पस नहीं मिलती। हम हेबियस कॉर्पस में ऑर्डर करते हैं। नाराजगी जताते हैं, तब पुलिस लेकर आ जाती है। आप खुद क्यों नहीं करते कुछ!
यदि किसी का नाम आया है, तो जांच तो कीजिए। कोई मिस्ट्री है, तो ओपन करो। यह 'पिक एण्ड चूज' वाला तरीका तो ठीक नहीं।
पुलिस नहीं है गंभीर
याचिकाकर्ता के वकील संदीप शाह का कहना था कि पुलिस जांच में कतई गंभीर नहीं है। आरोपियों के नाम स्पष्ट होने के बावजूद उनकी गिरफ्तारी के ठोस प्रयास नहीं किए जा रहे। पुलिस अफसरों ने आरोपियों को पकड़वाने पर इनाम घोषित करके कर्तव्य की इतिश्री कर ली। अघिवक्ता शाह व उनके सहयोगियों ने बड़े लोगों का हाथ बताते कोर्ट से दखल व भंवरी का पता लगाने को जांच अघिकारियों को पाबंद करवाने का अनुरोध किया।
सरकारी वकीलों की मांग ठुकराई
इसके विपरीत जांच अघिकारी हिम्मत अभिलाष, सरकारी वकील बरकत खान एवं प्रद्युम्नसिंह ने अदालत को बताया कि पुलिस ने इस प्रकरण के संदिग्ध शहाबुद्दीन, कुम्भाराम उर्फ बलदेव व सहीराम विनोई की तलाश शुरू कर दी है। आरोपी सोहनलाल विश्नोई पुलिस की गिरफ्त में है। भंवरी की तलाश के लिए 13 दल गठित किए हैं। उन्होंने अदालत से दो सप्ताह का वक्त मांगा, लेकिन पुलिस जांच की धीमी गति और अनुसंधान में विभिन्न कमियों को लेकर नाराज हाईकोर्ट ने सरकारी वकीलों की यह प्रार्थना ठुकरा दी।
क्या पुलिस नकारा है!
न्यायाधीश लोढ़ा ने अनुसंधान में कमियों व पुलिस के गंभीर नहीं होने पर कड़ी मौखिक टिप्पणी की। कहा, प्रकरण में सीबीआई जांच का प्रस्ताव कहां से आया? क्या राजस्थान पुलिस 'इनकॉम्पीटेंट' है!
ऎसे तो पूरे देश में घूम लो, क्या होगा
(अदालत की मौखिक टिप्पणियां)
शहाबुद्दीन गांव में नहीं है। फिर भी चार बार टीम उसके गांव ही भेजी। इससे क्या होगा!पुलिस अनुसंधान का 'क्लू' क्या है!ऎसे तो पूरे हिंदुस्तान में घूमो। उससे क्या होगा!
महीनों तक कॉर्पस नहीं मिलती। हम हेबियस कॉर्पस में ऑर्डर करते हैं। नाराजगी जताते हैं, तब पुलिस लेकर आ जाती है। आप खुद क्यों नहीं करते कुछ!
यदि किसी का नाम आया है, तो जांच तो कीजिए। कोई मिस्ट्री है, तो ओपन करो। यह 'पिक एण्ड चूज' वाला तरीका तो ठीक नहीं।
यदि कोई ATM CARD समेत आपका अपहरण कर ले तो विरोध मत कीजिए । अपहर्ता की इच्छानुसार ATM मशीन मेँ कार्ड डालिए । आपका कोड वर्ड रिवर्स मेँ डायल कीजिए । जैसे यदि आपका कोड 1234 की जगह 4321 डायल कीजिए । ऐसा करने पर ATM खतरे को भाँपकर पैसा तो निकालेगा लेकिन आधा ATM मशीन मेँ फँसा रह जायेगा । इसी बीच मेँ ATM मशीन खतरे को भाँपकर बैँक और नजदीकी पुलिस स्टेशन को सूचित कर देगा और साथ ही ATM का डोर ऑटो लॉक हो जाएगा । इस तरह बगैर अपहर्ता को भनक लगे आप सुरक्षित बच जाएँगे । ATM मेँ पहले से ही सिक्योरिटी मैकेनिजम है जिसकी जानकारी बहुत कम लोगोँ को है । कृपया इसे कॉपी पेस्ट करके लोगोँ तक पहुँचायेँ
गुरुवार, 22 सितंबर 2011
माँ को गले लगाते हो, कुछ पल मेरे भी पास रहो !
’पापा याद बहुत आते हो’ कुछ ऐसा भी मुझे कहो !
मैनेँ भी मन मे जज़्बातोँ के तूफान समेटे हैँ,
ज़ाहिर नही किया, न सोचो पापा के दिल मेँ प्यार न हो!
थी मेरी ये ज़िम्मेदारी घर मे कोई मायूस न हो,
मैँ सारी तकलीफेँ झेलूँ और तुम सब महफूज़ रहो,
सारी खुशियाँ तुम्हेँ दे सकूँ, इस कोशिश मे लगा रहा,
मेरे बचपन मेँ थी जो कमियाँ, वो तुमको महसूस न हो!
हैँ समाज का नियम भी ऐसा पिता सदा गम्भीर रहे,
मन मे भाव छुपे हो लाखोँ, आँखो से न नीर बहे!
करे बात भी रुखी-सूखी, बोले बस बोल हिदायत के,
दिल मे प्यार है माँ जैसा ही, किंतु अलग तस्वीर रहे!
भूली नही मुझे हैँ अब तक, तुतलाती मीठी बोली,
पल-पल बढते हर पल मे, जो यादोँ की मिश्री घोली,
कन्धोँ पे वो बैठ के जलता रावण देख के खुश होना,
होली और दीवाली पर तुम बच्चोँ की अल्हड टोली!
माँ से हाथ-खर्च मांगना, मुझको देख सहम जाना,
और जो डाँटू ज़रा कभी, तो भाव नयन मे थम जाना,
बढते कदम लडकपन को कुछ मेरे मन की आशंका,
पर विश्वास तुम्हारा देख मन का दूर वहम जाना!
कॉलेज के अंतिम उत्सव मेँ मेरा शामिल न हो पाना,
ट्रेन हुई आँखो से ओझल, पर हाथ देर तक फहराना,
दूर गये तुम अब, तो इन यादोँ से दिल बहलाता हूँ,
तारीखेँ ही देखता हूँ बस, कब होगा अब घर आना!
अब के जब तुम घर आओगे, प्यार मेरा दिखलाऊंगा,
माँ की तरह ही ममतामयी हूँ, तुमको ये बतलाऊंगा,
आकर फिर तुम चले गये, बस बात वही दो-चार हुई,
पिता का पद कुछ ऐसा ही हैँ फिर खुद को समझाऊंगा
’पापा याद बहुत आते हो’ कुछ ऐसा भी मुझे कहो !
मैनेँ भी मन मे जज़्बातोँ के तूफान समेटे हैँ,
ज़ाहिर नही किया, न सोचो पापा के दिल मेँ प्यार न हो!
थी मेरी ये ज़िम्मेदारी घर मे कोई मायूस न हो,
मैँ सारी तकलीफेँ झेलूँ और तुम सब महफूज़ रहो,
सारी खुशियाँ तुम्हेँ दे सकूँ, इस कोशिश मे लगा रहा,
मेरे बचपन मेँ थी जो कमियाँ, वो तुमको महसूस न हो!
हैँ समाज का नियम भी ऐसा पिता सदा गम्भीर रहे,
मन मे भाव छुपे हो लाखोँ, आँखो से न नीर बहे!
करे बात भी रुखी-सूखी, बोले बस बोल हिदायत के,
दिल मे प्यार है माँ जैसा ही, किंतु अलग तस्वीर रहे!
भूली नही मुझे हैँ अब तक, तुतलाती मीठी बोली,
पल-पल बढते हर पल मे, जो यादोँ की मिश्री घोली,
कन्धोँ पे वो बैठ के जलता रावण देख के खुश होना,
होली और दीवाली पर तुम बच्चोँ की अल्हड टोली!
माँ से हाथ-खर्च मांगना, मुझको देख सहम जाना,
और जो डाँटू ज़रा कभी, तो भाव नयन मे थम जाना,
बढते कदम लडकपन को कुछ मेरे मन की आशंका,
पर विश्वास तुम्हारा देख मन का दूर वहम जाना!
कॉलेज के अंतिम उत्सव मेँ मेरा शामिल न हो पाना,
ट्रेन हुई आँखो से ओझल, पर हाथ देर तक फहराना,
दूर गये तुम अब, तो इन यादोँ से दिल बहलाता हूँ,
तारीखेँ ही देखता हूँ बस, कब होगा अब घर आना!
अब के जब तुम घर आओगे, प्यार मेरा दिखलाऊंगा,
माँ की तरह ही ममतामयी हूँ, तुमको ये बतलाऊंगा,
आकर फिर तुम चले गये, बस बात वही दो-चार हुई,
पिता का पद कुछ ऐसा ही हैँ फिर खुद को समझाऊंगा
पी ढाबे वाला
बहुत दिनों बाद हुआ आना
इस पुराने शहर में
वहीं रुकता हूँ
वहीं खाता हूँ खाना
उसी बरसों पुरानी मेज पर
उस पुराने से ढाबे में।
कुछ भी नहीं बदला है
नहीं बदली है गोपी ढाबे वाले की
वह पुरानी-सी कमीज
काँधें पे पुराना गमछा
बातचीत का उसका अंदाज।
वैसा ही था
तड़के वाली दाल का भी स्वाद
तंदुरी रोटी की महक।
कुछ भी नहीं बदला
यहाँ तक की ग्राहकों की शक्लें
उनकी बोल-चाल का ढंग
ढाबे के बाहर खड़े सुस्ता रहे
खाली रिक्शों की उदासी तक।
उस कोने वाली मेज पर
वैसे ही बैठा खा रहा है खाना
चुपचाप एक लड़का
कुछ सोचता हुआ-सा, चिन्तित
शायद वह भी ढूँढ़ रहा है ट्यूशन
या कोई पार्ट टाईम जॉब
शायद करना है जुगाड़
अभी उसे कमरे के किराया का।
सोच-सोच कर कुम्हला रहा है उसका मन
कि कर भी पाएगा पढ़ाई पूरी
या धकेल देगा वापिस यह शहर
उन पथरीले पहाड़ों पर
जहाँ उगती है ढेर सारी मुसीबतें-ही-मुसीबतें
जहाँ दीमक लगे जर्जर पुलों को
ईश्वर के सहारे लाँघना पड़ता है हर रोज।
जहाँ जरा-सा बीमार होने का मतलब है
जिन्दगी के दरवाजे पर
मौत की दस्तक।
हैरान हूँ और खुश भी
दस वर्षों के बाद भी
नहीं भूला है गोपी
अपने ग्राहकों की शक्लें
पूछता रहा आत्मीयता से
घर-परिवार की सुख शान्ति।
इस बीच बहुत कुछ बदल गया
इस शहर में
बड़े-बड़े माल सेन्टरों ने
दाब लिया है
बड़े-बड़े लोगों का व्यापार
बड़ी-बड़ी अमीर कंपनियाँ
समा गई हैं बड़ी विदेशी
कंपनियों के पेट में।
नाम-निशान तक नहीं रहा
कई नामचीन लोगों का।
पुराने दोस्त इस तरह मिले
इतना भर दिया वक्त
जैसे पूछ रहा हो कोई अजनबी उनसे
अपने गंतव्य का पता।
निरन्तर विकसित हो रहे इस शहर में
उस गोपी ढाबे वाले की आत्मीयता ने
बचाए रखी मेरे सामने मेरी ही लाज।
सभी पुराने दोस्तों के बारे में भी
पूछता रहा बार-बार।
खास हिदायत देकर कहा उसने
रोटी बाँटने वाले लड़के को
बाबू जी खाना खाते हुए
पानी में नींबू लेते हैं जरूर।
मैं हैरान था और खुश भी
कि इस तरह की बातें तो
माँएँ ही रखती हैं याद
अपने बेटों के बारे में।
क्या इतना गहरे बैठे हुए थे
उसके अंतस में हम।
खाने के बाद गोपी ढाबे वाले ने
मुझसे पैसे नहीं लिये रोटी के
मेरे लाख अनुनय के बावजूद।
मैं इस तरह निकला वहाँ से
आँखें पोंछता हुआ
जैसे माँ की रसोई से निकला होऊँ
बरसों बाद खाना खा कर।
पहुँचना
मैं चाहता हूँ पहुँचना
तुम्हारे पास
जैसे दिन भर
काम पे गयी
थकी माँ पहुँचती है
अपने नन्हे बच्चे के पास।
सबसे कीमती पल होते हैं
इस धरती के वे
उसी तरह के
किसी कीमती पल-सा
पहुँचना चाहता हूँ तुम्हारे पास।
मैं चाहता हूँ पहुँचना
तुम्हारे पास
जैसे बरसों बंजर पड़ी
धरती के पास पहुँचते हैं
हलवाहे के पाँव
बैलों के खुर
और पोटली में रखे बीज
धरती की खुशियों में उतरते हुए
मैं पहुँचना चाहता हूँ तुम्हारे पास।
मैं चाहता हूँ
बारिश के इस जल सा
धरती की नसों में चलते-चलते
पेड़ों की हरी पत्तियों तक पहुँचूँ
फलों की मुस्कुराहट में उतरूँ
उनकी मीठास बन
तुम्हारे ओंठों तक पहुँचना चाहता हूँ
अँधेरे घर में
ढिबरी में पड़े तेल सा
जलते हुए
तुम्हारे साथ-साथ
अँधेरे से उजाले तक का
सफर तय करना चाहता हूँ।
निराशा भरे इस समय में
मैं तुम्हारे पास
संतों के प्रवचनों-सा नहीं
विज्ञापनों में फैली
व्यापारियों की चिकनी भाषा-सा नहीं
मैं कविता की गोद में बैठी
किसी सरल आत्मीय पंक्ति-सा
पहुँचना चाहता हूँ।
मैं चाहता हूँ
मैं पहुँचूँ तुम्हारे पास
जैसे कर्जे में फँसे
बूढ़े किसान पिता के पास
दूर कमाने गये
बेटे का मनीऑर्डर पहुँचता है।
आँखों में खुशी के आँसू छलकता
एक उम्मीद-सा
मैं पहुँचना चाहता हूँ
तुम्हारे पास
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारी आँखों में।
दुखों भरी बर्फ
दुखों भरी बर्फ जब पिघलेगी
तो खिलेंगे फूल-ही-फूल
इन पतझरी वृक्षों पर।
इन घासनियों में
उग आएगी नर्म हरी घास खूब
हम खुशी-खुशी घूमेंगे
इन घाटियों में अपने मवेशियों संग
मन पसंद गीत गुनगुनाते हुए।
दुखों भरी बर्फ जब पिघलेगी
दोस्त बिना बुलाए ही
आ जाएँगे हमारे घर
अचानक आ मिली खुशी की तरह
आ बैठेंगे हमारी देहरी पर
गुनगुनी धूप-सा मुस्कराते हुए।
हवा में भीनी गंध
अपने पंखों पे लादे
आ बैठेगी बसंत की चिड़िया
हमारे आँगन में
चहल कदमी करता
दूर से देखेगा हमें
हमारा छोटा-सा शर्मिला सुख।
दुखों भरी बर्फ जब पिघलेगी
हमारी जंग लगी दरातियों के चेहरों पर
आ जाएगी अनोखी उत्साह से भरी चमक
खेतों के चेहरे खिल उठेंगे
धूप हमारी आगवानी में
निखर-निखर जाएगी
हम मधुमक्खियों की तरह गुनगुनाते हुए
निकलेंगे अपने काम पर
नहीं फिसलेंगे
उस फिसलन भरी पगडंडी पर
किसी मवेशी के पाँव
नहीं मरेगी किसी की दुधारू गाय
नहीं बिकेगा कभी किसी का कोई खेत।
दुख भरी बर्फ का रंग
पहाड़ों पर गिरी इस मासूम बर्फ-सा
सफेद नहीं होता।
वह बादलों से नन्हें कणों के रूप में
नहीं झरती हमारे खेतों, घरों और देह पर
वह गिरती है कीच बनकर
धसकते पहाड़ों पर से
वह गिरती है शराब का रूप धर
पिता के जिस्म पर
माँ के कलेजे पर
हमारे भविष्य पर।
बदसलूकी की तरह गिरती है
जंगल में लकड़ियाँ लाने गई
बहिन की जिंदगी पर।
दुखों भरी बर्फ रोक देती है
स्कूल जाते बच्चों के रास्ते
उनके ककहरों के रंगों को
कर देती है धुंधला
छीन लेती है उनके भविष्य के चेहरों से
मासूम चमक
उनके हथेलियों को
बना देती है खुरदरा
भर देती है जख्मों से
उनके नन्हें कोमल पाँव।
दुखों भरी बर्फ पर
सूरज की तपिश का
नहीं होता कोई असर
अपने आप नहीं पिघलती।
वह पिघलती है
बुलंद हौंसलों से
विचारों की तपिश से
हमारे लड़ने के अंदाज से।
दुखों भरी बर्फ जब पिघलेगी
तो खिलेंगे फूल-ही-फूल
इन पतझरी वृक्षों पर।
बहुत दिनों बाद हुआ आना
इस पुराने शहर में
वहीं रुकता हूँ
वहीं खाता हूँ खाना
उसी बरसों पुरानी मेज पर
उस पुराने से ढाबे में।
कुछ भी नहीं बदला है
नहीं बदली है गोपी ढाबे वाले की
वह पुरानी-सी कमीज
काँधें पे पुराना गमछा
बातचीत का उसका अंदाज।
वैसा ही था
तड़के वाली दाल का भी स्वाद
तंदुरी रोटी की महक।
कुछ भी नहीं बदला
यहाँ तक की ग्राहकों की शक्लें
उनकी बोल-चाल का ढंग
ढाबे के बाहर खड़े सुस्ता रहे
खाली रिक्शों की उदासी तक।
उस कोने वाली मेज पर
वैसे ही बैठा खा रहा है खाना
चुपचाप एक लड़का
कुछ सोचता हुआ-सा, चिन्तित
शायद वह भी ढूँढ़ रहा है ट्यूशन
या कोई पार्ट टाईम जॉब
शायद करना है जुगाड़
अभी उसे कमरे के किराया का।
सोच-सोच कर कुम्हला रहा है उसका मन
कि कर भी पाएगा पढ़ाई पूरी
या धकेल देगा वापिस यह शहर
उन पथरीले पहाड़ों पर
जहाँ उगती है ढेर सारी मुसीबतें-ही-मुसीबतें
जहाँ दीमक लगे जर्जर पुलों को
ईश्वर के सहारे लाँघना पड़ता है हर रोज।
जहाँ जरा-सा बीमार होने का मतलब है
जिन्दगी के दरवाजे पर
मौत की दस्तक।
हैरान हूँ और खुश भी
दस वर्षों के बाद भी
नहीं भूला है गोपी
अपने ग्राहकों की शक्लें
पूछता रहा आत्मीयता से
घर-परिवार की सुख शान्ति।
इस बीच बहुत कुछ बदल गया
इस शहर में
बड़े-बड़े माल सेन्टरों ने
दाब लिया है
बड़े-बड़े लोगों का व्यापार
बड़ी-बड़ी अमीर कंपनियाँ
समा गई हैं बड़ी विदेशी
कंपनियों के पेट में।
नाम-निशान तक नहीं रहा
कई नामचीन लोगों का।
पुराने दोस्त इस तरह मिले
इतना भर दिया वक्त
जैसे पूछ रहा हो कोई अजनबी उनसे
अपने गंतव्य का पता।
निरन्तर विकसित हो रहे इस शहर में
उस गोपी ढाबे वाले की आत्मीयता ने
बचाए रखी मेरे सामने मेरी ही लाज।
सभी पुराने दोस्तों के बारे में भी
पूछता रहा बार-बार।
खास हिदायत देकर कहा उसने
रोटी बाँटने वाले लड़के को
बाबू जी खाना खाते हुए
पानी में नींबू लेते हैं जरूर।
मैं हैरान था और खुश भी
कि इस तरह की बातें तो
माँएँ ही रखती हैं याद
अपने बेटों के बारे में।
क्या इतना गहरे बैठे हुए थे
उसके अंतस में हम।
खाने के बाद गोपी ढाबे वाले ने
मुझसे पैसे नहीं लिये रोटी के
मेरे लाख अनुनय के बावजूद।
मैं इस तरह निकला वहाँ से
आँखें पोंछता हुआ
जैसे माँ की रसोई से निकला होऊँ
बरसों बाद खाना खा कर।
पहुँचना
मैं चाहता हूँ पहुँचना
तुम्हारे पास
जैसे दिन भर
काम पे गयी
थकी माँ पहुँचती है
अपने नन्हे बच्चे के पास।
सबसे कीमती पल होते हैं
इस धरती के वे
उसी तरह के
किसी कीमती पल-सा
पहुँचना चाहता हूँ तुम्हारे पास।
मैं चाहता हूँ पहुँचना
तुम्हारे पास
जैसे बरसों बंजर पड़ी
धरती के पास पहुँचते हैं
हलवाहे के पाँव
बैलों के खुर
और पोटली में रखे बीज
धरती की खुशियों में उतरते हुए
मैं पहुँचना चाहता हूँ तुम्हारे पास।
मैं चाहता हूँ
बारिश के इस जल सा
धरती की नसों में चलते-चलते
पेड़ों की हरी पत्तियों तक पहुँचूँ
फलों की मुस्कुराहट में उतरूँ
उनकी मीठास बन
तुम्हारे ओंठों तक पहुँचना चाहता हूँ
अँधेरे घर में
ढिबरी में पड़े तेल सा
जलते हुए
तुम्हारे साथ-साथ
अँधेरे से उजाले तक का
सफर तय करना चाहता हूँ।
निराशा भरे इस समय में
मैं तुम्हारे पास
संतों के प्रवचनों-सा नहीं
विज्ञापनों में फैली
व्यापारियों की चिकनी भाषा-सा नहीं
मैं कविता की गोद में बैठी
किसी सरल आत्मीय पंक्ति-सा
पहुँचना चाहता हूँ।
मैं चाहता हूँ
मैं पहुँचूँ तुम्हारे पास
जैसे कर्जे में फँसे
बूढ़े किसान पिता के पास
दूर कमाने गये
बेटे का मनीऑर्डर पहुँचता है।
आँखों में खुशी के आँसू छलकता
एक उम्मीद-सा
मैं पहुँचना चाहता हूँ
तुम्हारे पास
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारी आँखों में।
दुखों भरी बर्फ
दुखों भरी बर्फ जब पिघलेगी
तो खिलेंगे फूल-ही-फूल
इन पतझरी वृक्षों पर।
इन घासनियों में
उग आएगी नर्म हरी घास खूब
हम खुशी-खुशी घूमेंगे
इन घाटियों में अपने मवेशियों संग
मन पसंद गीत गुनगुनाते हुए।
दुखों भरी बर्फ जब पिघलेगी
दोस्त बिना बुलाए ही
आ जाएँगे हमारे घर
अचानक आ मिली खुशी की तरह
आ बैठेंगे हमारी देहरी पर
गुनगुनी धूप-सा मुस्कराते हुए।
हवा में भीनी गंध
अपने पंखों पे लादे
आ बैठेगी बसंत की चिड़िया
हमारे आँगन में
चहल कदमी करता
दूर से देखेगा हमें
हमारा छोटा-सा शर्मिला सुख।
दुखों भरी बर्फ जब पिघलेगी
हमारी जंग लगी दरातियों के चेहरों पर
आ जाएगी अनोखी उत्साह से भरी चमक
खेतों के चेहरे खिल उठेंगे
धूप हमारी आगवानी में
निखर-निखर जाएगी
हम मधुमक्खियों की तरह गुनगुनाते हुए
निकलेंगे अपने काम पर
नहीं फिसलेंगे
उस फिसलन भरी पगडंडी पर
किसी मवेशी के पाँव
नहीं मरेगी किसी की दुधारू गाय
नहीं बिकेगा कभी किसी का कोई खेत।
दुख भरी बर्फ का रंग
पहाड़ों पर गिरी इस मासूम बर्फ-सा
सफेद नहीं होता।
वह बादलों से नन्हें कणों के रूप में
नहीं झरती हमारे खेतों, घरों और देह पर
वह गिरती है कीच बनकर
धसकते पहाड़ों पर से
वह गिरती है शराब का रूप धर
पिता के जिस्म पर
माँ के कलेजे पर
हमारे भविष्य पर।
बदसलूकी की तरह गिरती है
जंगल में लकड़ियाँ लाने गई
बहिन की जिंदगी पर।
दुखों भरी बर्फ रोक देती है
स्कूल जाते बच्चों के रास्ते
उनके ककहरों के रंगों को
कर देती है धुंधला
छीन लेती है उनके भविष्य के चेहरों से
मासूम चमक
उनके हथेलियों को
बना देती है खुरदरा
भर देती है जख्मों से
उनके नन्हें कोमल पाँव।
दुखों भरी बर्फ पर
सूरज की तपिश का
नहीं होता कोई असर
अपने आप नहीं पिघलती।
वह पिघलती है
बुलंद हौंसलों से
विचारों की तपिश से
हमारे लड़ने के अंदाज से।
दुखों भरी बर्फ जब पिघलेगी
तो खिलेंगे फूल-ही-फूल
इन पतझरी वृक्षों पर।
कहवाघरों की सर्द बहसों में
अपने को खोने से बेहतर है
घर में बीमार बीबी के पास बैठो,
आईने के सामने खड़े होकर
उलझे बालों को संवारो -
अपने को आंको,
थके हारे पड़ौसी को लतीफा सुनाओ
बच्चों के साथ सांप-सीढ़ी खेलो -
बेफ़िक्र फिर जीतो चाहे हारो,
कहने का मकसद ये कि
खुद को यों अकारथ मत मारो !
जरूरी नहीं
कि जायका बदलने के लिए
मौसम पर बात की जाए
खंख किताबों पर ही नहीं
चौतरफ दिलो-दिमाग पर
अपना असर कर चुकी है -
खिड़की के पल्ले खोलो
और ताजा हवा लेते हुए
कोलाहल के बीच
उस आवाज की पहचान करो
जिसमें धड़कन है ।
आंख भर देखो उस उलझी बस्ती को
उकताहट में व्यर्थ मत चीखो,
बेहतर होगा -
अगर चरस और चूल्हे के
धुंए में फ़र्क करना सीखो !
उकताहट में व्यर्थ मत चीखो,
बेहतर होगा -
अगर चरस और चूल्हे के
धुंए में फ़र्क करना सीखो !
तुम यकीन करोगी -
तुम्हारे साथ एक उम्र जी लेने की
कितनी अनमोल सौगातें रही हैं मेरे पास:
सुनहरी रेत के धोरों पर उगती भोर
लहलहाती फसलों पर रिमझिम बरसता मेह
कुछ नितान्त अलग-सी दीखती हरियाली के बिम्ब
बरसाती नदियों की उद्दाम लहरें
और दरख्तों पर खिलते इतने इतने फूल…….
कोसों पसरे रेतीले टीबों में
खोए गांवों की उदास शामें -
सूनी हवेलियों के
बहुत अकेले खण्डहर,
सूखे कुए के खम्भों पर
प्यासे पंछियों का मौन
अकथ संवाद,
कुलधरा-सी सूनी निर्जन बस्तियां
मन की उदासी को गहराते
कुछ ऐसे ही दुर्लभ दरसाव
हर पल धड़कती फकत् एक अभिलाषा -
जीवन के फिर किसी मोड़ पर
तुम्हारी आंख और आगोश में
अपने को विस्मृत कर देने की चाह
और यही कुछ सोचते सहेजते
मैं थके पांव लौट आता हूं
बीते बरसों की धुंधली स्मृतियों के बीच
गो कि कोई शिकायत नहीं है
अपने आप से -
फकत् कुछ उदासियां हैं
अकेलेपन की !
तुम्हारे साथ
बीते समय की स्मृतियों को जीते
कुछ इस तरह बिलमा रहता हूं
अपने आप में,
जिस तरह दरख्त अपने पूरे आकार
और अदीठ जड़ों के सहारे
बना रहता है धरती की कोख में ।
जिस तरह
मौसम की पहली बारिश के बाद
बदल जाती है
धरती और आसमान की रंगत
ऋतुओं के पार
बनी रहती है नमी
तुम्हारी आंख में -
इस घनी आबादी वाले उजाड़ में
ऐसे ही लौट कर आती
तुम्हारी अनगिनत यादें -
अचरज करता हूं
तुम्हारा होना
कितना कुछ जीता है मुझ में
इस तरह !
जिस वक्त में यहाँ होता हूँ
तुम्हारी आँख में
कहीं और भी तो जी रहा होता हूँ
किसी की स्मृतियों में शेष
शायद वहीं से आती है मुझमें ऊर्जा
इस थका देने वाली जीवन–यात्रा में
फिर से नया उल्लास
एक सघन आवेग की तरह
आती है वह मेरे उलझे हुए संसार में
और सुगंध की तरह
समा जाती है समय की संधियों में मौन
मुझे राग और रिश्तों के
नये आशय समझाती हुई।
उसकी अगुवाई में तैरते हैं अनगिनत सपने
सुनहरी कल्पनाओं का अटूट एक सिलसिला
वह आती है इस रूखे संसार में
फूलों से लदी घाटियों की स्मृतियों के साथ
और बरसाती नदी की तरह फैल जाती है
समूचे ताल में
उसी की निश्छल हँसी में चमकते हैं
चाँद और सितारे आखी रात
रेतीले धोरों पर उगते सूरज का आलोक
वह विचरती है रेतीली गठानों पर निरावेग
उमड़ती हुई घटाओं के अन्तराल में गूँजता है
लहराते मोरों का एकलगान
मन की उमंगों में थिरक उठती है वह
नन्हीं बूँदों की ताल पर।
उसकी छवियों में उभर आता है
भीगी हुई धरती का उर्वर आवेग
वह आँधी की तरह घुल जाती है
मेह के चौतरफा विस्तार में
मेरी स्मृतियों में
देर तक रहता है उसके होने का अहसास
सहेज कर जीना है
उसकी ऊर्जा को अनवरत।
मैं जो एक दिन
मैं जो एक दिन
तुम्हारी अधखिली मुस्कान पर रीझा,
अपनों की जीवारी और जान की खातिर
तुम्हारी आंखों में वह उमड़ता आवेग -
मैं रीझा तुम्हारी उजली उड़ान पर
जो बरसों पीछा करती रही -
अपनों के बिखरते संसार का,
तुम्हारी वत्सल छवियों में
छलकता वह नेह का दरिया
बच्चों की बदलती दुनिया में
तुम्हारे होने का विस्मय
मैं रीझा तुम्हारी भीतरी चमक
और ऊर्जा के उनवान पर
जैसे कोई चांद पर मोहित होता है -
कोई चाहता है -
नदी की लहरों को
बांध लेना बाहों में !
आज फिर आई तुम्हारी याद
तुम फिर याद में आई –
आकर समा गई चौतरफ
समूचे ताल में ।
रात भर होती रही बारिश
रह-रह कर हुमकता रहा आसमान
तुम्हारे होने का अहसास –
कहीं आस-पास
भीगती रही देहरी
आंगन-द्वार
मन तिरता-डूबता रहा
तुम्हारी याद में।
भगवान की प्रतिज्ञा
मेरे मार्ग पर पैर रखकर तो देख ;
तेरे सब मार्ग न खोल दूँ तो कहना ||
मेरे लिए खर्च करके तो देख ;
कुबेर के भंडार न खोल दूँ तो कहना ||
मेरे लिए कडवे कडवे वचन सुनकर तो देख ;
कृपा न बरसे तो कहना ||
मेरी तरफ आ करके तो देख ;
तेरा ध्यान न रखूँ तो कहना ||
मेरी बातें लोगों से करके तो देख ;
तुझे मूल्यवान न बना दूँ तो कहना ||
मेरे चरित्रों का मनन करके तो देख ;
ज्ञान का मोती तुझमें न भर दूँ तो कहना ||
मुझे अपना मददगार बनाकर तो देख ;
तुझे सबकी से न छुडा दूँ तो कहना ||
मेरे लिए आसू बहाकर तो देख ;
जीवन में आनंन्दके सागर न बहा दूँ तो कहना ||
मेरे लिए कुछ बनाकर तो देख ;
तुझे कीमती न बना दूँ तो कहना ||
मेरे मार्ग पर निकलकर तो देख ;
तुझे शांतिदूत न बना दूँ तो कहना ||
स्वयं को न्योछावर करके तो देख ;
तुझे मशहूर न करा दूँ तो कहना ||
मेरा कीर्तन करके तो देख ;
जगत का विस्मरण न करा दूँ तो कहना
श्री सीरवी सेवा मंण्डल विल्लिवाकम चेन्नई
श्री सीरवी समाज विल्लिवाकम चेन्नई
लेखक
सुखाराम सोलंकी सीरवी
मेरे मार्ग पर पैर रखकर तो देख ;
तेरे सब मार्ग न खोल दूँ तो कहना ||
मेरे लिए खर्च करके तो देख ;
कुबेर के भंडार न खोल दूँ तो कहना ||
मेरे लिए कडवे कडवे वचन सुनकर तो देख ;
कृपा न बरसे तो कहना ||
मेरी तरफ आ करके तो देख ;
तेरा ध्यान न रखूँ तो कहना ||
मेरी बातें लोगों से करके तो देख ;
तुझे मूल्यवान न बना दूँ तो कहना ||
मेरे चरित्रों का मनन करके तो देख ;
ज्ञान का मोती तुझमें न भर दूँ तो कहना ||
मुझे अपना मददगार बनाकर तो देख ;
तुझे सबकी से न छुडा दूँ तो कहना ||
मेरे लिए आसू बहाकर तो देख ;
जीवन में आनंन्दके सागर न बहा दूँ तो कहना ||
मेरे लिए कुछ बनाकर तो देख ;
तुझे कीमती न बना दूँ तो कहना ||
मेरे मार्ग पर निकलकर तो देख ;
तुझे शांतिदूत न बना दूँ तो कहना ||
स्वयं को न्योछावर करके तो देख ;
तुझे मशहूर न करा दूँ तो कहना ||
मेरा कीर्तन करके तो देख ;
जगत का विस्मरण न करा दूँ तो कहना
श्री सीरवी सेवा मंण्डल विल्लिवाकम चेन्नई
श्री सीरवी समाज विल्लिवाकम चेन्नई
लेखक
सुखाराम सोलंकी सीरवी
प्यार गया पैसा गया और गया व्यापर ||
दर्शन दुर्लभ हो गया जबसे दिया उदार |
मेहरवानी करके इन सब्दो को प्रियोग ना करे||
लिख लेना – बाद में लेना |
आकर देता हू – भेज देता हू ||
दे देगा –कल देता हू |
सुबह देता हू –पहेचानता नहीं कीया||
भरोषा नहीं क्या – भाग जाऊंगा क्या |
खा जाऊंगा क्या –||
उधर आपकी सुविधा हे –हक नहीं |
उधर प्रेम की केची ||
जय माता दी सा
जय आईजी री सा
सीरवी समाज विल्लिवाकम चेन्नई
भगवान की प्रतिज्ञा
मेरे मार्ग पर पैर रखकर तो देख ;
तेरे सब मार्ग न खोल दूँ तो कहना ||
मेरे लिए खर्च करके तो देख ;
कुबेर के भंडार न खोल दूँ तो कहना ||
मेरे लिए कडवे कडवे वचन सुनकर तो देख ;
कृपा न बरसे तो कहना ||
मेरी तरफ आ करके तो देख ;
तेरा ध्यान न रखूँ तो कहना ||
मेरी बातें लोगों से करके तो देख ;
तुझे मूल्यवान न बना दूँ तो कहना ||
मेरे चरित्रों का मनन करके तो देख ;
ज्ञान का मोती तुझमें न भर दूँ तो कहना ||
मुझे अपना मददगार बनाकर तो देख ;
तुझे सबकी से न छुडा दूँ तो कहना ||
मेरे लिए आसू बहाकर तो देख ;
जीवन में आनंन्दके सागर न बहा दूँ तो कहना ||
मेरे लिए कुछ बनाकर तो देख ;
तुझे कीमती न बना दूँ तो कहना ||
मेरे मार्ग पर निकलकर तो देख ;
तुझे शांतिदूत न बना दूँ तो कहना ||
स्वयं को न्योछावर करके तो देख ;
तुझे मशहूर न करा दूँ तो कहना ||
मेरा कीर्तन करके तो देख ;
जगत का विस्मरण न करा दूँ तो कहना
श्री सीरवी सेवा मंण्डल विल्लिवाकम चेन्नई
श्री सीरवी समाज विल्लिवाकम चेन्नई
लेखक
सुखाराम सोलंकी सीरवी
मेरे मार्ग पर पैर रखकर तो देख ;
तेरे सब मार्ग न खोल दूँ तो कहना ||
मेरे लिए खर्च करके तो देख ;
कुबेर के भंडार न खोल दूँ तो कहना ||
मेरे लिए कडवे कडवे वचन सुनकर तो देख ;
कृपा न बरसे तो कहना ||
मेरी तरफ आ करके तो देख ;
तेरा ध्यान न रखूँ तो कहना ||
मेरी बातें लोगों से करके तो देख ;
तुझे मूल्यवान न बना दूँ तो कहना ||
मेरे चरित्रों का मनन करके तो देख ;
ज्ञान का मोती तुझमें न भर दूँ तो कहना ||
मुझे अपना मददगार बनाकर तो देख ;
तुझे सबकी से न छुडा दूँ तो कहना ||
मेरे लिए आसू बहाकर तो देख ;
जीवन में आनंन्दके सागर न बहा दूँ तो कहना ||
मेरे लिए कुछ बनाकर तो देख ;
तुझे कीमती न बना दूँ तो कहना ||
मेरे मार्ग पर निकलकर तो देख ;
तुझे शांतिदूत न बना दूँ तो कहना ||
स्वयं को न्योछावर करके तो देख ;
तुझे मशहूर न करा दूँ तो कहना ||
मेरा कीर्तन करके तो देख ;
जगत का विस्मरण न करा दूँ तो कहना
श्री सीरवी सेवा मंण्डल विल्लिवाकम चेन्नई
श्री सीरवी समाज विल्लिवाकम चेन्नई
लेखक
सुखाराम सोलंकी सीरवी
प्यार गया पैसा गया और गया व्यापर ||
दर्शन दुर्लभ हो गया जबसे दिया उदार |
मेहरवानी करके एन सब्दो को प्रियोग ना करे||
लिख लेना – बाद में लेना |
आकर देता हू – भेज देता हू ||
दे देगा –कल देता हू |
सुबह देता हू –पहेचानता नहीं कीया||
भरोषा नहीं क्या – भाग जाऊंगा क्या |
खा जाऊंगा क्या –||
उधर आपकी सुविधा हे –हक नहीं |
उधर प्रेम की केची ||
जय माता दी सा
जय आईजी री सा
सीरवी समाज विल्लिवाकम चेन्नई
मंगलवार, 20 सितंबर 2011
मोबाईल रा थे देखो खटका |
हर एक हाथ में मोबाईल रा लटका ||
मिनक लुगाई री देखो मति जात|
मोबाईल बिना करे कोणी बात ||
जेब में कोणी एक ओनी |
पर मोबाईल बिना धक्के कोणी कोई ||
फोन लगा के करे हाका |
बिल देखने फाड़े बाका ||
घाडी चलावत करे बाता |
फसे सफाकाना में काडे राता||
फसे रोवे गोडा ने |
तो थे भी ध्यान राखाजो इनी बातारो ||
सोमवार, 5 सितंबर 2011
आपभी दो हाथसे दुआ मांगते है
और हमभी दो हाथसे प्रणाम करते है,
हमभी जुक के तेरे शरण छुते है
और वो भी ज़ुक्के नमाज अदा करते है,
हम भी दिल से राम बोलते है
और वो भी दिल से अल्लह को पुकारते है,
वो भी फुल चढाते है
और हम भी तो अपनी श्रध्दा फुल ही चढाते है,
वो भी उपरवालेकी इबादत करते है
हमभी उपरवालेकी प्रार्थना करते है,
हमनेभी कभी उसको देखा नहीं
और उसनेभी कभी उसको पाया नहीं है,
सोचता हु ऐसा क्यु है की हमारे
और उनके विचार कभी नहीं मिलते है
शुक्रवार, 2 सितंबर 2011
सन 1982 में सिंगापूर में लोकपाल जैसा बिल लागु हुआ था
तब 142 भ्रष्ट मंत्री और आफिसर एक दिन में गिरफ्तार हुए
थे............................
आज सिंगापूर में गरीबी 1 % है लिक्ट्रेसी 92 %उच्च स्वस्थ सुविधाए,
सस्ती दर पर दैनिक उपभोक्ता वस्तु,ए 90 % व्हाईट मनी 1 %
बेरोजगारी ..............................
PLEASE COPY AND FOREWORD..............
अब बताये लोकपाल जरुरी है या नहीं ..............................
यदि हां तो इस सन्देश को फारवर्ड करे ........!!! [
सन 1982 में सिंगापूर में लोकपाल जैसा बिल लागु हुआ था तब 142 भ्रष्ट मंत्री और आफिसर एक दिन में गिरफ्तार हुए थे............................
आज सिंगापूर में गरीबी 1 % है लिक्ट्रेसी 92 %उच्च स्वस्थ सुविधाए, सस्ती दर पर दैनिक उपभोक्ता वस्तु,ए 90 % व्हाईट मनी 1 % बेरोजगारी ..............................
PLEASE COPY AND FOREWORD..............
अब बताये लोकपाल जरुरी है या नहीं ..............................
यदि हां तो इस सन्देश को फारवर्ड करे ........!!! [
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)